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कोचिंग का कमरतोड़ बोझ, बच्चों को कैसे दिलाएं आराम!

प्रकाशित Fri, 17, 2019 पर 08:02  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

दसवीं की परीक्षा के बाद ही शुरू हो जाती कोचिंग क्लासों की कमरतोड़ पढ़ाई। मगर कोचिंग क्लासों की पढ़ाई वाकई में बच्चों के लिए कमरतोड़ साबित हो रही है। 12 से 16 घंटे की पढ़ाई बच्चों को 16-17 साल की उम्र में ही बुढापे की बीमारियों का शिकार बना रही है। उन्हें अभी से कमरदर्द, पीठ दर्द की शिकायत होने लगी है। इस शो में कोचिंग के कमरतोड़ बोझ पर बात करेंगे और अपने एक्सपर्ट्स से जानेंगे कि बच्चों को कैसे इससे आराम दिलाया जा सकता है।


कोचिंग क्लास एक ऐसी जगह है जहां पढ़े बगैर अच्छा करियर बनाने का सपना सिर्फ सपना ही लगता है। आज के एजुकेशन सिस्टम में ये एक गैरवाजिब जरूरत बन गया है। मगर अब कोचिंग की पढ़ाई हमारे बच्चों को बीमार कर रही है। जर्नल ऑफ फैमली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 87 फीसदी बच्चों को मांसपेशियों को दर्द की शिकायत है। 43 फीसदी बच्चों को कमर के निचले हिस्से में तो 32 फीसदी को पीठ के ऊपरी हिस्से में दर्द रहता है। 28 फीसदी बच्चों के कंधे में दर्द रहता है तो 36 फीसदी एड़ी और पैरों के दर्द से परेशान हैं। 20 फीसदी बच्चों को घुटने, कोहनी और कलाई का दर्द रहने लगा है।


दरअसल ये रिपोर्ट भोपाल के एम्स और दिल्ली से सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों की एक स्टडी का हिस्सा है। इस स्टडी के लिए इन डॉक्टरों ने 5 कोचिंग सेंटरों के 488 छात्रों को चुना था। ये बच्चे कोचिंग सेंटरों में रोजाना 12 से 16 घंटे की पढ़ाई कर रहे हैं। 2.5 से 3 घंटे की पढ़ाई तो बिना ब्रेक के होती है। ज्यादातर वक्त ये बच्चे बेंच पर बैठते हैं और उस पर बैक सपोर्ट के नाम पर कुछ खास नहीं होता। कोचिंग की पढ़ाई के लंबे घंटे और बैठने की अपर्याप्त जगह बच्चों को अभी से बुढ़ापे की बीमारियों को शिकार बना रही है।


जानकारों का कहना है कि इस कमरतोड़ बोझ से बच्चों को बचाने के लिए 1 घंटे से ज्यादा की क्लास नहीं होनी चाहिए। हर 3 घंटे की पढ़ाई के बाद ब्रेक जरूरी है। कुर्सी पर बैठे-बैठे हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें। बैठे-बैठे कमर और गरदन की कसरत संभव है। कोचिंग सेंटर कुछ देर के लिए एक्सरसाइज ब्रेक रखें। बेंच की जगह आरामदायक कुर्सी की व्यवस्था होनी चाहिए।