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Coronavirus pandemic: SARS-Cov-2 वायरस ने अभी तक बदले 11 रूप- ICMR

शोध में शामिल करीब 45.7 फीसदी भारतीय नमूने टाइप A2a के है जो वूहान चाइना में पहली बार पाए गए टाइप O ट्रेंड से उत्तपन्न (इवॉल्व) हुए है।
अपडेटेड May 27, 2020 पर 08:41  |  स्रोत : Moneycontrol.com

भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि नोबल कोरोना वायरस फैमिली के सबसे प्रमुख वायरस SARS-Cov-2 ने अब तक कम से कम 11 बार अपना रूप बदला है या म्यूटेट हुआ है।


नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोमेडिकल जियोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने 55 देशों के 3636 मरीजों से लिए गए जिनोम सिक्वेसिंग (genome sequencing) का अध्ययन करके ये निष्कर्ष निकाला है। इन सैंपलों में 21 भारतीय सैंपल भी शामिल हैं।


BusinessLine में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) इंस्टीट्यूट वेस्ट बंगाल के शोधकर्ताओं ने कहा है कि फरवरी-मार्च में उत्पन्न हुआ सबसे प्रभावी कोरोना वायरस A2a टाइप का था।


गौरतलब है जब कोई वायरस म्यूटेट होता है तो वह  जैव अनुवांशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी) उत्पन्न करने के लिए अपना रूप बदलता है। किसी वायरस के सरवाइवल (जीवित रहने के लिए) उसका फार्म या रूप बदलना जरुरी होता है। कोई वायरस जितना ज्यादा म्यूटेट होता है उसकी संख्या (प्रोडक्शन) उतनी ज्यादा बढ़ती है।


इस रिपोर्ट में इंडियन जनरल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा गया है कि कोरोना का टाइप A2a वायरस जो 1,848 (51%) सैंपल में पाया गया,  वूहान चाइना में पाए गए कोरोना के पहले टाइप O के स्ट्रेन से विकसित हुआ है।


भारत से लिए गए नमूनों में से 16 यानी 45.5%  A2a टाइप के थे। 13 यानी 37.1%  A3 टाइप के थे। 5 यानी 14.3% के O टाइप के थे जबकि सिर्फ 1 यानी 2.9% B टाइप का था।


इस स्टडी में भारत में होस्ट मरीजों के बड़े नंबर पर जिनोम सिक्वेसिंग की सिफारिश की गई है जिससे वायरस गठन के क्षेत्रीय और एथेनिक (नस्लीय)  विविधताओं को समझने में सहायता मिलेगी।


पहले भी इस तरह की खबरें आई थी कि कोरोना का  A2a टाइप संक्रमण सबसे ज्यादा प्रभावी है और दुनिया भर के सभी क्षेत्रों में फैल गया है।


एक और अध्ययन में कहा गया है कि नोबल कोरोना वायरस का A2a म्यूटेशन सबसे ज्यादा संक्रामक है। यह बड़ी संख्या में मानव फेफड़ों की कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है।  2010 में फैले SARS-CoV वायरस ने करीब 8000 लोगों को संक्रमित किया था और इससे 800 लोगों की मौत हुई थी। यह भी मानव फेफड़ों की कोशिकाओं पर अटैक करता था लेकिन यह कोरोना के A2a टाइप की तुलना में कम संक्रामक था।


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