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Coronavirus: भारत में क्या चीन की जगह लेने का दम है?

कोरोना को रोकने में चीन की नाकामी को लेकर जैसा सेंटीमेंट बन रहा है उसमें भारत खुद को चीन के विकल्प के तौर पर पेश कर सकता है
अपडेटेड Apr 02, 2020 पर 14:42  |  स्रोत : Moneycontrol.com

अभिषेक अनेजा


कुछ दिन पहले तक दुनियाभर में अर्थव्यवस्थाएं ग्लोबल स्लोडाउन से जूझ रही थीं। इसके अलावा चीन और अमेरिका के बीच छिड़े ट्रेड वॉर और ब्रेग्जिट की चिंताएं भी सामने मौजूद थीं।


Coivd-19 के अचानक से दस्तक देने से दुनिया एक अनिश्चितता भरे दौर में चली गई है। दुनिया इस अनदेखे दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार नहीं थी। ऐसे में जब कोरोना वायरस तेज रफ्तार से एक देश से दूसरे देश होता हुआ दुनियाभर में फैला तो सरकारों को समझ नहीं आया कि इस संकट से लोगों को और अर्थव्यवस्था को कैसे बचाया जाए।


लॉकडाउन से रुका कारोबारी चक्का


ऐसे में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार दुनिया को अपने अस्तित्व को बचाने की जंग शुरू करनी पड़ी। सरकारों के सामने सबसे पहले अपने नागरिकों जान बचाने की चुनौती है, और उसके बाद देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने की लड़ाई लड़नी है।


कोरोना की वजह से शहर और पूरे के देश लॉकडाउन में रहने को मजबूर हो गए हैं। सीमाएं बंद कर दी गई हैं। लोगों को घरों में कैद रहना पड़ रहा है। अनुमान है कि Covid-19 का कहर अगले तीन से छह महीने तक जारी रह सकता है। ऐसे में दुनिया के मंदी में जाने के पूरे आसार हैं।


आर्थिक सुस्ती के दौर में कोरोना बढ़ाएगा सरकारी खर्च


भारत की अगर बात करें तो कंज्यूमर डिमांड कमजोर पड़ गई है। ऑटोमाबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट सेक्टर पहले से ही सुस्ती की चपेट में थे और इनमें नजदीकी वक्त में कोई रिकवरी होना मुश्किल दिखाई दे रहा है। प्राइवेट इनवेस्टमेंट रुक गया है।


इस महामारी से लड़ने के लिए भारत को एक बड़ी पूंजी खर्च करनी पड़ेगी। पीएम नरेंद्र मोदी ने 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान किया है। लोगों को घरों में रहने के लिए कहा गया है। इस वजह से पूरा औद्योगिक उत्पादन ठप्प पड़ा है। जब तक कोरोना के खिलाफ जंग रहेगी और इसका खतरा खत्म नहीं हो जाता तब तक सारी एक्टिविटीज बंद ही रहेंगी।


सरकार के सामने हैं बड़ी चुनौतियां


सीएमआईई के मुताबिक, फरवरी 2020 में बेरोजगारी दर 7.8 फीसदी थी। लॉकडाउन के चलते बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूर गांवों और कस्बों में अपने घर वापस चले गए हैं। ऐसे में बेरोजगारी में और इजाफा होना तय है।


इस महामारी से निपटने के लिए सरकार का फोकस इस बात पर है कि लोग अपने घरों के भीतर रहें ताकि इस वायरस को फैलने से रोका जा सके।


प्रशासन की कोशिश है कि जरूरी चीजों की सप्लाई न रुके। साथ ही सरकार हेल्थकेयर इक्विपमेंट्स को बाहर से खरीदने और इनके उत्पादन को बढ़ाने की कोशिश कर रही है ताकि मरीजों की संख्या में होने वाली बढ़ोतरी के वक्त हालात को कंट्रोल में रखा जा सके।


अंकटाड ने अनुमान लगाया है कि ग्लोबल एफडीआई में 30-40 फीसदी तक की गिरावट आएगी। साथ ही मर्जर और एक्वीजिशन डील्स भी 70 फीसदी की गिरावट का शिकार हो सकती हैं। मल्टी नेशनल एंटरप्राइजेज (MNE) अपने इनवेस्टमेंट बजट की समीक्षा कर रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वक्त में प्राइवेट इनवेस्टमेंट में कटौती होगी।


ग्रोथ के 2.1 फीसदी रह जाने की आशंका


ट्रैवल, हॉस्पिटैलिटी, एविएशन और ट्रेड जैसे सेक्टरों पर बुरी चोट पड़ी है। आने वाले दिनों में इनमें रिकवरी होने में शायद सबसे ज्यादा वक्त लगेगा।


कोविड-19 के आर्थिक असर को देखते हुए इकनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट (EIU) ने भारत की ग्रोथ का फोरकास्ट पहले के 6 फीसदी से घटाकर 2.1 फीसदी कर दिया है।


ऐसे में सरकार के लिए आर्थिक हालात को संभालने की बड़ी चुनौती है। सरकार को अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए आउट ऑफ द बॉक्स उपायों के लाना पड़ेगा।


क्या चीन का विकल्प बन पाएगा भारत?


हालांकि, कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में नाकामी को लेकर चीन के खिलाफ सेंटीमेंट में इजाफा होने से भारत इस मौके का फायदा उठा सकता है। भारत खुद को चीन के विकल्प के तौर पर पेश कर सकता है।


हालांकि, इसके लिए मौजूदा पॉलिसीज में आमूलचूल बदलाव की जरूरत होगी। भारत को अपने टैक्सेशन नियमों में भी बदलाव करना होगा ताकि देश में कारोबार करना जटिल न रहे। सरकार को कारोबारी तबके के साथ मिलकर काम करना होगा और उनमें भरोसा कायम करना होगा।


पॉलिसीज को दुरुस्त करना होगा


हाल के वक्त में टैक्स अधिकारियों के कारोबारियों को टैक्स मसलों को लेकर परेशान करने के मामले दिखाई दिए हैं। इन चीजों को रोकना होगा। इससे विदेशी और घरेलू दोनों तरह की कंपनियों को प्रोत्साहन मिलेगा।


सस्ता कर्ज, टैक्स इनसेंटिव्स, स्टांप ड्यूटी खत्म करने और कंपनियों के लिए आसान तरीके से फंडिंग उपलब्ध कराने से इनवेस्टमेंट को फिर से जिंदा किया जा सकता है।


घरेलू डिमांड बढ़ाने के लिए नकद बिक्री पर पाबंदियों और अतिरिक्त टैक्स जैसी चीजों में ढील दी जानी चाहिए। यह भारत में पेमेंट का पारंपरिक तरीका रहा है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसे का फ्लो बढ़ेगा।


(लेखक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।


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