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आवाज़ अड्डाः किसानों का गुस्सा बिगाड़ेगा चुनावों में खेल!

प्रकाशित Fri, 30, 2018 पर 07:42  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

पिछले एक साल में देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों के आंदोलनों ने जोर पकड़ा है। लेकिन इस बार का विरोध प्रदर्शन खास है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी रह गए हैं। ऐसे में किसानों ने सरकार को अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो इसका खामियाजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ेगा। किसान पूरी तरह से कर्ज माफी और फसल लागत की डेढ़ गुना कीमत मांग रहे हैं। राजनीतिक दल किसानों के दर्ज को भांप भी रहे हैं। इसलिए राजस्थान,  मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में उन पर फोकस है। कुछ राज्यों में किसानों का कर्ज माफ भी हुआ है। सवाल ये है कि क्या सरकार को सभी किसानों का एक साथ कर्ज माफ कर देना चाहिए?


किसानों के अल्टीमेटम का असर क्या चुनावों में भी दिखेगा। किसान पूरी तरह से कर्ज माफी और स्वामीनाथन कमिटी के फॉर्मूले के आधार पर फसल की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी की मांग कर रहे हैं। किसान संगठनों की मांग है कि सरकार विशेष सत्र बुलाए जहां सिर्फ किसानों के मुद्दे पर चर्चा हो।


किसानों की बदहाली का मुद्दा विधानसभा चुनावों में भी हावी दिख रहा है।कांग्रेस ने पांच राज्यों के दौरान अपने चुनावी घोषणापत्र में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों की कर्ज माफी का वादा किया है। राजस्थान में कृषि उपकरणों को जीएसटी से बाहर रखने और बुजुर्ग किसानों को घर बैठे पेंशन देने का वादा है। जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों का आधा बिजली बिल माफ करने का वादा किया है। मध्य प्रदेश में हर ग्राम पंचायत में गोशाला खोलने की बात भी कही है। वहीं बैकफुट पर बीजेपी अपने अब तक किए काम का हवाला दे रही है।


राजस्थान में बीजेपी सरकार ने किसानों का 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ किया है। जबकि दोबारा सरकार आने पर किसानों के लिए ऋण राहत आयोग और 250 करोड़ रुपए का किसान ग्रामीण स्टार्टअप फंड बनाने की बात कही है। वहीं मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए पिछले एक साल में करीब 32 हजार करोड़ रुपए दिए। छत्तीसगढ़ में बीजेपी 60 साल से ज्यादा उम्र के छोटे किसानों और भूमिहीन कृषि मजदूरों को एक हजार रूपये प्रति महीने पेंशन देने का वादा किया है। जबकि अगले पांच सालों में किसानों को 2 लाख नए पंप दिए जाएंगे।


पिछले साल दिल्ली में हुई किसान संसद में किसानों को कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलाने और फसल की लाभकारी कीमत सुनिश्चित करने के लिए दो प्रस्ताव पारित किए गए थे। लेकिन सरकार ने इन मुद्दों पर अब तक जो किया है उससे किसान खुश नहीं हैं। अपनी मांगों को लेकर महाराष्ट्र में किसान कई बार मुंबई की तरफ कूच कर चुके हैं। कर्नाटक और राजस्थान जैसे राज्यों में किसानों की कुछ कर्ज माफी हुई है।


सवाल ये है कि क्या किसानों की हालत सुधारने में सरकार ने कोताही की है। फिर वो सरकार केंद्र की हो या राज्य की। चुनाव के करीब अगर सत्तारूढ़ पार्टियां वादे कर रही हैं तो पिछले वर्षों में ऐसा करने से उन्हें कौन रोक रहा था। किसानों की किस्तों में जो कर्ज माफी का चलन चल गया है क्या उसकी जगह एक बार में ही उनका कर्ज माफ करके आगे का एक्शन प्लान तैयार नहीं करना चाहिए। किसानों की आमदनी दोगुना करने को लेकर सरकार ने जो किया है क्या वो काफी है या अभी हमें लंबा सफर तय करना है?