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भारत को हर साल बसाना होगा शिकागो के आकार का एक शहर, जानिए क्यों और कैसे!

नए शहर बसाने की बात आने पर हमारे जेहन में यूधिष्ठिर के हस्तिनापुर को बसाने की बात आती है।
अपडेटेड Jun 17, 2020 पर 16:18  |  स्रोत : Moneycontrol.com

श्रीगोपाल काबरा


महाभारत और रामायण के प्रासारण काल में अगर मैं अपनी बात एक कहानी के रूप में कहूं तो एक समय की बात है कि गूगल मैप ने मुझे बताया कि मुझे अपनी कार से घर वापस जाने के लिए सिर्फ 18 किमी की दूरी तय करने में 3 घंटे 20 मिनट लगेंगे। गूगल ने मुझे सलाह दी कि ये दूरी पैदल चल कर कहीं जल्दी तय की जा सकती है। मुझे लगा कि गूगल मुझसे मजाक कर रहा है। फिर मैनें ये दूरी कार से ही तय करने का निर्णय लिया, मुझे घर पहुचने में 4 घंटे लगे।


इस कहानी में आप एक द्रष्टा हैं  जिसका लक्ष्य भारत के विकास में सहायता करना है। सर्विस सेक्टर आधारित जीडीपी  में भारतीय शहर अहम भूमिका निभाते हैं। इन शहरों में प्रतिभाएं आती हैं, निखरती हैं और काम पाती हैं। फिर मुंबई जैसे ये शहर बढ़ते जन प्रवाह के चलते एक समय जनसंख्या के बोझ तले दबने लगते हैं। अब आप वर्तमान शहरों को ही अपग्रेड करना चाहते हैं। लेकिन सवाल ये है कि कैसे? हमने सिटी प्लानिंग और डिजाइनिंग के गुर पश्चिमी दुनिया से सीखें हैं जिनकी आबादी बहुत कम है। अगर हम शहरों को अपग्रेड और डिजाइन करने के इन तरीकों को अपनी जरूरत के हिसाब से नहीं बदलते हैं तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी और भारतीय शहरों की स्थितियां और खराब हो जाएंगी। हमें इस संदर्भ में जापान के उदाहरण को ध्यान में रखना चाहिए। ध्यान में रखें की किसी पुराने शहर को अपग्रेड करना बहुत जटिल होता है। लेकिन याद रखिए आप एक द्रष्टा (visionary) हैं हार मान के नहीं बैठ सकते।


अब अगर आप शहरों के तरफ आते प्रवासियों को रोक देते हैं तो लागतें बढ़नें लगती हैं और विकास रुक जाता है। अगर आप शहर में प्रवासियों को आने देते हैं तो शहर की बुनियादी सुविधाओं पर दबाव बढ़ता जाता है और शहर में रहने वालों के जीवन स्तर में गिरावट आने लगती है। ऐसी स्थिति में क्या होगा जब हम प्रवासियों का रुख नए शहर की ओर मोड़ दें? इससे वर्तमान शहरों की बुनियादी सुविधाओं पर दबाव कम होगा और यहां रहने वालों के लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा। देश का विकास जारी ही नहीं रहेगा बल्कि और बढ़ेगा भी। जानकारों का कहना है कि भारत को अपने शहरीकरण और जीडीपी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगले 10 साल तक हर साल शिकागो का आकार का एक शहर बसाना होगा।


अब आप अपने लक्ष्य पर काम करना शुरू करते हैं। लेकिन अब आपके सामने पहले मुर्गी या अंडा वाली समस्या आ जाती है। प्रतिभाएं उसी तरफ जाती हैं जहां काम मिलता है और काम वहीं रहता है जहां प्रतिभाएं रहती हैं। एंकर कंपनियां प्रतिभाओं की कमी के कारण नए शहरों में काम शुरू करने से हिचकती हैं। वहीं काम न होने की वजह से प्रतिभाएं नए शहरों में नहीं जान चाहतीं। अब आप लगभग हारने की स्थिति में आ जाते हैं। लेकिन कोविड 19 अचानक सबकुछ बदलकर रख देता है और वर्क फ्रॉम होम सामान्य सी बात हो जाती है। अब पहले अंडा या मुर्गी की समस्या का समाधान मिलने लगता है। हमें पता चलता है कि प्रतिभा अपने कार्यस्थल से दूर रहकर भी काम कर सकती है और इस अवधारणा पर नए शहर बसाए जा सकते हैं।


इस तरीके से हम अपने नगरिकों के क्वालिटी ऑफ लाइफ और लिविंग स्टैंडर्ड में प्रभावी सुधार कर सकते हैं। इससे हमारे पहले से आबादी के बोझ से दबे जा रहे शहरों में नए आने वालों लोगों का प्रवाह रुक जाएगा। शहरों की परिवाहन और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं में सुधार आएगा, तमाम तरह के प्रदूषण कम होंगे और लोगों के जीवन स्तर और जीवन शैली में भी सुधार देखने को मिलेगा। इन नए शहरों के निर्माण से हमारा कॉस्टबेस प्रतिस्पर्धी बनेगा। भारत सर्विस सेक्टर में वही मुकाम हासिल कर सकता है जो चीन ने मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में हासिल किया है। कंपनियों को पहले से ही बहुत महंगे हो चुके शहरों में रियलस्टेट प्रॉपर्टी खरीदने से निजात मिलेगी। इन नए शहरो में सस्ती  रियलस्टेट प्रॉपर्टी मिलेगी और कंपनियां अपने कारोबार में ज्यादा निवेश कर पाएंगी। ये हमारे लिए एक मौका है, हमें इस पर ध्यान देना चाहिए। आज हम एक चौराहे पर खड़े हैं। हमारा भविष्य क्या होगा ये इस बात पर निर्भर करेगा कि हम क्या निर्णय लेते हैं।


कहां बसें नए शहर


नए शहर बसाने की बात आने पर हमारे जेहन में यूधिष्ठिर के हस्तिनापुर को बसाने की बात आती है। अगर आप एक व्यावहारिक द्रष्टा हैं तो आपका ये पता है कि कोई नया शहर बासाना आसान काम नहीं। लोग अपने वर्तमान निवास स्थान से तमाम आर्थिक और भावनात्मक सूत्रों से बंधे होते हैं। आपको किसी जगह से बांध कर रखने वाले इन सूत्रों में आपका परिवार, मित्र, नेटवर्क, फेमिली डॉक्टर ओर लोकल परचून की दुकान वाला तक शामिल होते हैं। इन सबको अपने साथ ले चलना मुश्किल है। लेकिन अगर आपको इनकों कहीं ले जाने की जरूरत ही न हो तब? आपको उनको सिर्फ वहीं रोके रखना हो तो?


COVID-19 संकट के दौरान सिर्फ कुछ सप्ताहों में ही 300,000 लाख लोगों ने मुंबई से कोकन जाने के लिए आवेदन किया। इतने ही या इससे कुछ ज्यादा लोगों  देश के दूसरे हिस्सों की तरफ जा रहे हैं। ये प्रवासी जहां लौट रहें हैं वो स्थान उनके मूल स्थान हैं जहां से वे भावनात्मक रुप से जुड़े हुए हैं।  वहां उनके रुके रहने के लिए हमें उन्हीं स्थानों पर नए शहर बसाने होंगे। अगर इन लोगों को रिमोट वर्किंग की सुविधा दी जाए तो प्राकृतिक रूप से वहीं नए शहर बस जाएंगे। जीवन एक बहती नदी की तरह होता है। कई बार आपको नदी की प्रवाह की दिशा में जाना पड़ता है। इसी तरह प्रतिभाएं भी उसी तरफ जाती हैं जिस तरफ प्रवाह होता है।


मनुष्य लगातार अपने जीवन स्तर में सुधार करने के प्रयास में रहता है। हम बेहतर अवसर और जीवन शैली वाले स्थानों की तलाश में रहते हैं। अवसरों और सुविधाओं के विकेंद्रीकरण के साथ ही जीवन की गुणवत्ता की तरफ आकर्षण और अहम हो जाता है।


नए शहरों में सबसे पहले वाटर सप्लाई, बिजली, साफ-सफाई, शहरी परिवहन, आईटी कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत होगी। इसके बाद उपयुक्त मौसम, पर्यावरण, सुरक्षा, शिक्षा, अफोर्डेबल हाउसिंग, खुले स्थानों की जरूरत होगी। नए शहरों में रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और वाटरवेज जैसी कनेक्टिविटी सेवाए भी होनी चाहिए। इन सेवाओं को बनाए रखने को लिए हर शहर को निम्नतम रेवेन्यू  की जरुरत होगी और उसको चुकाने के लिए एक आबादी की। जानकारों का कहना है कि इस तरह के किसी नए शहर की आबादी कम से कम 80 हजार से 1 लाख होनी चाहिए।


कैसे होगी इसकी फंडिंग?


यह इस योजना का ऐसा सबसे अहम पक्ष है जहां हमें सबसे ज्यादा इनोवेशन की जरूरत होगी। 2018 के इकोनॉमिक सर्वे आफ इंडिया में कहा गया है कि हमें 2040 तक इंफ्रास्ट्रक्चर पर 4.5 ट्रिलियन डॉलर या 45 लाख करोड़ रुपये  का निवेश करना होगा। यह एक बहुत बड़ी राशि है। भारत के सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी शहरीकरण प्रोजेक्ट  Smart Cities को सिर्फ  48,000 करोड़ रुपये का आबंटन मिल सका है जो 2040 तक की जरूरत का 1 फीसदी ही है। इसमें से भी सिर्फ 24000 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली है और अब तक सिर्फ 6000 करोड़ रुपये खर्च किए जा सके हैं। इसका मतलब ये है कि प्रति स्मार्ट सिटी प्रति वर्ष सिर्फ 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं जो सिर्फ एक सीवेज सिस्टम बनाने के लिए पर्याप्त है।


राज्यों से फंड जुटाने की बात करें तो हमारे 28 में से 20 राज्य कर्ज से डूबे हुए हैं। इनमें से कुछ तो दिवालिया होने के कगार पर हैं। फंड जुटाने का पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी फार्मूला भी जमीन अधिग्रहण का भारी लागत, रेग्यूलेटरी लेट-लतीफी और ऊंची कर्ज लागत की वजह से अव्यावहारिक हो जाती है।


200 साल के औपनिवेशिक शोषण के बाद सिर्फ 75 की स्वतंत्रता वाले भारत के पास खर्च करने के लिए कोई पिछली बचत भी नहीं है। हम अपने विकास के लिए वही खर्च कर सकते हैं जो हम अभी कमा रहे हैं ये आगे कमाएंगे।


अपनी स्वतंत्रता के समय सिंगापुर के पास भी संशाधनों का अभाव था। कारोबारियों, कंपनियों और प्रतिभा को आकर्षित करने वाली टैक्स नीतियों और सक्षम सरकारी नीतियों के चलते ही सिंगापुर अपना वर्तमान मुकाम हासिल कर सका है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के 80 फीसदी उद्योग-धंधे चौपट हो गए थे। उसने अपने  उद्योग-धंधों को फिर से खड़ा करने के लिए और बड़े पैमाने पर कम लागत में उत्पादन करने के लिए अनुशान और अपनी कार्यक्षमता का उपयोग किया। भारत इस ओवर सप्लाई वाली दुनिया में बहुत बड़ा बाजार है और इसके सप्लायर ही इसके फाइनेंसर बन सकते हैं। शहरों को अपने ही बनाए रियल एस्टेट बूम में भाग लेना चाहिए अपने मुनाफे से ऋण भुगतान करना चाहिए। भारत इसके लिए क्राउड फंडिग तकनीक का भी प्रयोग कर सकता है। हम अपने किसी शहर को स्टॉक मार्केट में लिस्ट करवा सकते हैं और बाजार के जरिए आम निवेशकों से पैसे जुटा सकते हैं। ये समय परंपरागत तरीके के हटकर कुछ अलग सोचने और करने का है।
 
कैसे होगा इसका कार्यान्वयन?


कोई भी बड़ी योजना तभी सफल होती है जब उसके सभी पक्षों को समायोजित और सही तरीके से लागू किया जाता है। इस योजना को नीति, गवर्नेंस और कार्यान्वयन इन तीनों मानकों पर सफल होना होगा।


नीति: भारत को स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने में कुछ सफलता जरूर मिली है। अब समय आ गया है जब हम SEZ बनाने के अपने अमुभव को शहरों को बसाने में करें। इसके लिए हमें निश्चित क्षेत्र में सस्ते घर, किसी खास एरिया में किसी खास तरह के कंस्ट्रक्शन  गतिविधियों पर कम टैक्स और हॉस्पिटल स्कूल जैसे जीवनावश्यक कारोबारों के लिए कम टैक्स जैसे प्रावधान करने होंगे जिससे लोग इन खास क्षेत्रों में बसना चाहेंगे और ग्रोथ को बढ़ावा मिलेगा।


गवर्नेंस: भारत के साथ एक और बड़ी समस्या ये है कि यहां केन्द्र और राज्यों में सरकारों के बदलने के साथ नीतियां भी तेजी से बदलती रहती हैं। सरकार बदलने के साथ ही प्राथमिकताएं और योजनाएं भी बदल जाती हैं और तमाम अच्छी योजनाएं भी अटक जाती हैं। शहर बसाने का काम एक लंबा समय लेने वाला काम है। इस काम में सफलता के लिए नीतियों में स्थिरता और एकरूपता की जरूरत होगी।


दिल्ली मेट्रो इसका एक उदाहरण है। कोलकाता मेट्रो के लंबे समय तक लटकने के बाद DMRC को लोगों को हायर करने, टेंडर निकालने और फंड पर नियंत्रण के लिए काफी स्वायत्तता दी गई। विलंब को रोकने को लिए सुप्रीमकोर्ट से अग्रिम निर्देश लिए गए। हमें भी अपनी योजना को लागू करने के लिए इसी तरह के गवर्नेंस की जरुरत होगी।


कार्यान्वयन: इसका कार्यान्वयन कितना मुश्किल हो सकता है इसको एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। भारत में हमारे पास करीब 5000 टाउन प्लानर हैं। हम हर साल करीब 600 टाउन प्लानर तैयार करते हैं। लेकिन हमें अपने प्रोजेक्ट की सफलता के लिए 3 लाख से लेकर 10 लाख तक टाउन प्लानरों की जरूरत होगी। 


प्रॉसेस मैप और टाइमलाइन ही इस योजना की सफलता को तय करेंगे। प्रॉसेस या प्रक्रिया को जितना हो सके उतना सरल होना चाहिए। इसमें एक केंद्रीय निगरानी व्यवस्था के साथ ही निर्धा़रित समय सीमा में काम पूरा करने का प्रावधान होना चाहिए। योजना की सफलता के लिए जमीन अधिग्रहण और टेंडर प्रक्रिया को आसान और भ्रष्टाचार मुक्त रखना होगा। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया को दलाल या मध्यस्थ मुक्त रखना होगा और मजबूत ऑडिट व्यवस्था करनी होगी।


इस तरह की बड़ी परियोजन में हमसे गल्तियां भी हो सकती हैं। इनसे बचने के लिए हमें सीईओ स्टाइल के गवर्नेंस की जरूर होगी। उदाहरण के लिए हम नवी मुंबई पर नजर डाल सकते हैं। इसके लिए सिडको ने प्राइवेट सेक्टर के टैलेंट पूल का इस्तेमाल किया। टाटा ग्रुप का हिस्सा रहे और टाइटान को सफलता दिलाने वाले  Mr. Xerxes Desai को नवी मुंबई प्रोजेक्ट के लिए नियुक्त किया गया। नवी मुंबई के विकास के लिए सिडको टाउन प्लानरों, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों, शोधार्थियों और अभियंताओं की एक जोरदार टीम को एक मंच पर ले आई।


नवी मुंबई के विकास के लिए सिडको ने  Charles Correa को ऑर्किटेक्ट नियुक्त किया तो शिरीश पटेल को अर्बन प्लानर बनाया। UAE न्यूयॉर्क से आकार में 33 गुना बड़ा शहर बसाने की तैयारी में है। इसकी जिम्मेंदारी सीमेंस एजी के चीफ एक्जीक्यूटिव को दी गई है। अगर हमको भी ऐसा ही कुछ बड़ा करना है तो हमें भी सक्षम और कुशल लोगों की एक टीम की जरूरत होगी।


किन गलतियों से है बचने की जरुरत?


चीन पर ऐसे घोस्ट सिटी बनाने का आरोप है जहां पर सारी बुनियादी सुविधाएं तो है लेकिन कोई रहने वाला नहीं लेकिन नए शोध से पता चलता है कि यह बात पहले सही रही होगी लेकिन चीन की यह योजना काफी सोच-समझकर बनाई गई थी और इनको भविष्य की जरुरतों के लिए अभी के सिद्धांत पर बनाया गया था। चीन के इस तरह के शहरों जैसे  Pudong, Zhejiang New Town, Zhengdong New Area, Tianducheng  पर नजर डालें तो ये अब चहल-पहल से भर गए है। ऐसा लगता है कि चीन ने समय से पहले ही यह कदम उठा लिए थे।


यह एक ऐसी समस्या है जिसका सामना भारत को भी एक दिन करना पड़ेगा। हालांकि हम पहले ही काफी लेट हो चुके है। भारत को पहले से योजनाबद्ध शहर बसाने का अनुभव है। चंडीगढ़ की प्लानिंग, फ्रांसीसी शहरी योजनाकार द्वारा 1949 में की गई थी और यह भारत की एक सफल कहानी है। इसी तरह नवीं मुंबई, जमशेदपूर, जामनगर , मदुरई कुछ दूसरे सफल उदाहरण है।


इसके अलावा भारत में कुछ ऐसे उदाहरण है जो असफल भी रहे हैं। जैसे महिंद्रा वर्ल्ड सिटी और लवासा। इनकी असफलता का कारण यह रहा कि इनको बसाने के पीछे कोई बड़ा कारण या उद्देश्य नहीं था। इस समय वर्क फ्रॉम होम के पक्ष में बने माहौल को देखते हुए देश में कई टू और थ्री टियर शहरों के बड़े शहर के रुप में विकास की व्यापक संभावना है।


तो हमें आगे क्या करना चाहिए?


सबसे पहले तो सभी कंपनियों को एक कॉमन फोरम पर आना चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि उनके कारोबार से संबंधित कौन से काम ऐसे है जिनको कर्मचारी घर से कर सकते  हैं। उसके बाद हमें ऐसे लोगों की पहचान करनी चाहिए जो यह काम कर सकते है। कौन लोग यह काम कर सकते है वह लोकल है या प्रवासी है, अगर वह प्रवासी है तो वह कहां से है। फिर उसके बाद पहचाने गए स्थानों को शहर के रूप में विकसित करने के लिए चुना जाना चाहिए।




श्रीगोपाल काबरा आरआर ग्लोबल  के  मैनेजिंग डायरेक्टर हैं.






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