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आवाज अड्डाः EC के एक्शन पर दिखा विपक्ष का रिएक्शन

प्रकाशित Fri, 17, 2019 पर 08:03  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

बंगाल का बवाल बढ़ता ही जा रहा है और अब मामला बीजेपी और टीएमसी के बीच नहीं रह गया है। पूरा सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने है। लेकिन इस बवाल में अब विलेन बन गया है चुनाव आयोग। दोनों ही पक्ष आरोप लगा रहे हैं कि आयोग दूसरे पक्ष के हाथों में कठपुतली बन गया है। कोलकाता में अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा के बाद चुनाव आयोग ने बंगाल में प्रचार का समय एक दिन घटा दिया। राज्य के दो बड़े अधिकारियों को भी हटा दिया। इसने जैसे ममता बनर्जी समेत पूरे विपक्ष को एक होने का मौका दे दिया है। विपक्षी पार्टियों ने मोदी-शाह की आलोचना करने के साथ-साथ चुनाव आयोग पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उधर बीजेपी का सवाल है कि बंगाल में भारी हिंसा के बावजूद चुनाव आयोग ने इतनी देर से और इतनी कम कार्रवाई क्यों की? साफ है कि इलेक्शन कमीशन पर पक्षपात करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। सवाल ये है कि क्या चुनाव आयोग एकतरफा कार्रवाई कर रहा है? या फिर इस बार विपक्षी पार्टियों ने अपनी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए ईवीएम की जगह चुनाव आयोग को चुन लिया है?


पश्चिम बंगाल में अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा पर चुनाव आयोग की कार्रवाई ने पूरा राजनीतिक माहौल ही बदल दिया है। चुनाव आयोग ने राज्य में प्रचार का समय एक दिन घटा दिया। साथ ही ममता बनर्जी के नजदीकी दो बड़े अधिकारियों को भी हटा दिया। ममता बनर्जी का भड़कना तय था। उन्होंने चुनाव आयोग पर मोदी-शाह के इशारे पर काम करने का आरोप लगा दिया। मोदी-शाह को लेकर ममता का गुस्सा थम नहीं रहा है।


दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी ममता बनर्जी के साथ नजदीकी दिखाने का मौका मिल गया है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग के फैसले को लोकतंत्र पर काला धब्बा बताया। मायावती और अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग पर पक्षपात करने का आरोप लगा दिया। कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों की नियुक्ति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वो इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव की वकालत कर रहे हैं।


चुनाव आयोग को अगर बीजेपी से थोड़ा साथ मिलने की आस थी तो उसे यहां भी मायूस होना पड़ा। बीजेपी भी आयोग के एक्शन से नाखुश है। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के आखिरी दिन भी मोदी के निशाने पर ममता दीदी ही रहीं।


अब सवाल है कि क्या दो पार्टियों के आक्रामक रवैये में चुनाव आयोग कोलैटरल डैमेज का शिकार हो गया है? क्या चुनाव आयोग के अधिकार इतने व्यापक हैं कि वो ज्यादा कड़े एक्शन कर पाता? विपक्ष आयोग पर पक्षपात करने और मोदी सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगा रहा है। क्या चुनाव आयोग पर सरकार का दबाव काम कर रहा है? सवाल ये भी है कि क्या हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की साख कम हुई है? क्या सिर्फ इसके लिए ईसी जिम्मेदार है या वो जहरीला राजनीतिक माहौल जिसमें उसे हर वक्त काम करना पड़ता है?