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सरकार और आरबीआई में मतभेद, क्या बच पाएगी साख!

प्रकाशित Wed, 31, 2018 पर 13:41  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

रिजर्व बैंक और सरकार में रसाकस्सी चल रही है। एक तरफ एक चुनी हुई सरकार है तो दूसरी ओर एक स्वतंत्र रेगुलेटर। दिलचस्प ये है कि दोनों से ही देश की भलाई के लिए काम करने की उम्मीद रहती है। लेकिन फिलहाल इस मकसद को हासिल करने के तरीके को लेकर दोनों भिड़ गए हैं। बात यहां तक बिगड़ गई है कि आरबीआई डिप्टी गवर्नर को सीधे सरकार को चेतावनी देनी पड़ी। आम तौर पर सरकार के साथ काम करने के लिए मशहूर आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे की अटकलें चल रही हैं। आखिर सरकार रिजर्व बैंक से क्या और क्यों मनवाना चाहती है और आरबीआई सरकार के सामने क्यों नहीं झुकना चाहती है ये बड़े सवाल हैं। लेकिन इस पूरे मामले में आरबीआई की साख को लेकर चिंता जरूर पैदा हो गई है।


आरबीआई को लेकर सरकार ने अपने बयान में कहा कि एक्ट के तहत रिजर्व बैंक की स्वायत्तता सुरक्षित है। आरबीआई और सरकार दोनों जनहित में काम करते हैं। कई मुद्दों पर सरकार आरबीआई के साथ चर्चा करती है। सरकार ऐसे मामले कभी सार्वजनिक नहीं करती और केवल अंतिम फैसला ही सार्वजनिक किया जाता है। आरबीआई और सरकार के बीच चर्चा आगे भी जारी रहेगी।


सरकार और आरबीआई के विवाद पर एक नजर डालते हैं। सरकार की दलील है कि पावर कंपनियों के लोन को एनपीए घोषित करने में रियायत बरती जाए जबकि आरबीआई का कहना है कि उसके लिए सभी एनपीए बराबर हैं। सरकार चाहती है कि आरबीआई के रिजर्व का इस्तेमाल बैंकों के रीकैपिटलाइजेशन के लिए किया जाए लेकिन आरबीआई की दलील है कि रिजर्व का उपयोग नहीं किया जा सकता है।


सरकार की मांग थी कि पीएसी के तहत गए बैंकों को नए लोन देने की छूट दी जाए जबकि आरबीआई का कहना है कि पीएसी में केवल ट्रिपल-ए रेटिंग वाली कंपनियों को लोन देने की इजाजत होगी। आरबीआई की ये भी दलील है कि अगर पीएसी के तहत गए बैंकों को नए लोन देने की छूट दी जाती है तो एनपीए और बढ़ने का डर है।


सरकार ने सेक्शन-7 को लागू किया और अब आरबीआई को सीधे आदेश देगी। बता दें कि 3 बार पहले भी सेक्शन-7 का इस्तेमाल हो चुका है। सरकार को बैंकों के लिए कैपिटल की जरूरत है, ऐसे में सरकार आरबीआई के रिजर्व का इस्तेमाल कर सकती है। सरकार एनबीएफसी को ज्यादा लिक्विडिटी देने के पक्ष में है।


पीएसयू बैंकों के नियंत्रण पर जेटली-उर्जित के तीखे बयान आए हैं। सरकार ज्यादा डिविडेंड चाहती है लेकिन आरबीआई ने हाथ खींच लिए। सरकार सख्त एनपीए नियमों में ढील चाहती है। एसएमई और पेमेंट रेगुलेटर पर भी सरकार और आरबीआई आमने-सामने हैं। यस बैंक, बंधन बैंक, इक्विटास, उज्जीवन पर सख्ती से भी सरकार नाराज है। सरकार गिरते रुपये को थामने के पक्ष में है जबकि आरबीआई का कहना है कि महंगाई कम करना हमारा काम है और रुपया खुद भाव तय करेगा। सरकार पर विरल आचार्य के बयान के बाद भी और तल्खी बढ़ी है।


गौरतलब है कि अगर आरबीआई गवर्नर इस्तीफा देते हैं तो रुपये में गिरावट आएगी। बॉन्ड बाजार में एफआईआई की बिकवाली देखने को मिलेगी। रेटिंग पर तुरंत असर की आशंका नहीं लेकिन नया गवर्नर कौन बनता है ये देखना अहम होगा। नया गवर्नर स्वतंत्र छवि वाला होना जरूरी है।