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स्टे हैप्पी से घटाएं अपनी दवाईयों का बिल, 67 शहरों तक फैला नेटवर्क

जेनरिक मे़डिकल स्टोर्स की कमी के चलते लॉन्च होते ही स्टे हैप्पी ने तेज रफ्तार पकड़ ली, आज स्टे हैप्पी 67 शहरों में अपनी पकड़ बना चुका है।
अपडेटेड Oct 13, 2019 पर 11:11  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

आपको सबसे पहले मिलवाते हैं 23 साल की arushi Jain से जिनको अपने स्टार्टअप का आईडिया Ernst & Young में फार्मा कंपनियों की रिपोर्ट ऑ़डिट करते समय आया। ढेरों कंपनियों की बूक्स analyze करते वक्त arushi को एहसास हुआ की भारत में दवाईयां सस्ती नहीं हैं और खासकर ब्रांडेड दवाईयां generic दवाईयों से 5 से 10 गुना मंहगी है। यहीं देख Arushi ने शुरू कि एक एसी pharmacy chain जो सिर्फ generic दवा बेचती हैं। StayHappi ने पिछले एक साल में 67 cities में अपनी पकड बना ली हैं।


गरीबों के लिए बीमार होना किसी श्राप से कम नही, डॉक्टर्स के चार्जेस के बाद दवाईयों के मोटे बिल्स आम लोगों की कमर तोड़ देते है। भारत में दवाइओं पर पर कैपिटा एक्सपेंडिजर इतना ज्यादा है की गरीब जनता के लिए बीमारी से ठीक होना सपना बनकर रह गया है। बीमारी के बाद हंसी खुशी मेडिसिन बिल अदा करने के उद्देश्य से    2017 में स्टे हैप्पी की शुरुआत हुई थी। ये स्टार्टअप लोगों को सस्ती और क्वालिटी दवाएं देने का वादा कर रहा है। स्टे हैप्पी उन हजारों लोगों को जीने का बुनियादी हक देती है, जो over priced medicinies और unavailablity के कारण अपनी जिंदगी खो देते हैं।​


जेनरिक मे़डिकल स्टोर्स की कमी के चलते लॉन्च होते ही स्टे हैप्पी ने तेज रफ्तार पकड़ ली और बहुत कम समय में ही देश भर में 282 लाइव स्टोर्स खोल लिए हैं। देश के 13 राज्यों को कवर करते हुए आज स्टे हैप्पी 67 शहरों में अपनी पकड़ बना चुका है। कंपनी का अगला मकसद जल्द ही ऑनलाइन एप लॉन्च करने का है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग घर बैठे ही दवाएं पा सके। 


स्टे हैप्पी का मानना है कि सेहत सबसे महत्वपर्ण है और सही दवा चुनना मरीज का अधिकार है। नए पुराने, गंभीर सभी तरह की बीमारियों के मेडीसिन कंपनी कवर करना चाहती है, लेकिन अभी कैंसर और टीबी जैसी बीमारियां हैं, जिनपर कंपनी ने काम नहीं शुरू किया है। कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज काफी हद तक डॉक्टर्स की सलाह पर निर्भर करते है। ग्राहक सीधे फार्मसी से कनेक्ट नही करते, बाजार में नया होने के चलते कंपनी की पहुंच अभी तक सीमित है, साथ ही जानलेवा बीमारियों के मामले में भरोसा हासिल करना भी बडा चैलेंज है, साथ ही कैंसर मेडीसिन्स महंगा होना भी बड़ी दिक्कत है, फाउंडर्स का कहना है कि कैंसर सेगमेंट जरुर टैप किया जाएगा, लेकिन लोगों का भरोसा पूरी तरह जीत लेने के बाद ही टैप किया जायेगा।


कंपनी 3 तरह के बिजनेस मॉडल पर काम करती है। पहला ऑफलाइन में खुद के स्टोर शुरू करते हुए। दूसरा मॉडल फ्रेंचाइसी के जरिए, इसमें कंपनी जिलों के मौजूदा स्टोर के साथ कोलैबोरेशन करती है और उस इलाके में अपनी पहुंच बनाती है और तीसरा वर्टिकल है ऑनलाइन,  कंपनी 3 महीने के अंदर-अंदर अपना एप लॉन्च करने की तैयारी में है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कंपनी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सबसे पहले तो लोगों में विश्वास पैदा करना ही सबसे ज्यादा मुश्किल रहा। आज भी पेशंट डॉक्टर द्वारा लिखे ब्रांडेड दवाओं पर ज्यादा भरोसा करते हैं, कीमत और क्वालिटी को इस कदर जोडा गया है, कि सस्ती दवाएं भरोसा जीतने में ही समय गवां रही है, कंपनी अलग-अलग जगहों पर वर्कशॉप्स कर लोगों का भरोसा बनाने में जुटी है, लेकिन मुनाफे से अभी भी दूरी बनी हुई है।


कंपनी वैसे तो तीन मकसद पर काम कर रही है लेकिन पहला विजन लोगों को अफोर्डेबल दवाएं देना ही है। कंपनी लैब कंस्ल्टेशन और सही डॉक्टर से लोगों को मशविरा दिलाने पर काम करेगी। इसके लिए कई लैब पार्टनर और डॉक्टर से टाई अप करने का काम जारी है। आने वाले समय में  एप में कई फीचर्स जुड़ेंगे, अलग-अलग थेरेपी के लिए डॉक्टर्स का कनसल्टेशन मुहैया कराएगी। अगले 1 साल में कंपनी 1500 कैटगरीज की दवाओं के सेल का लक्ष्य रखती है। आज भी कई लोगों जेनरीक मेडीसिन के बारे में जानकारी नहीं है।  सस्ती दवाएं आसानी से मिलने का इस तरीके से ही लोग वाकीफ नही है  इसीलिए भारत में लोगों को कंजुमर जागरूक करना कंपनी की प्राथमिकता है। 


​भारत में फार्मा मार्केट करीब 1 लाख 10,000 हजार करोड़ का है जिसमें जेनरिक मेडीसिन 1 प्रतिशत से कम हिस्सा रखते  है। देश की आम और जरुरतमंद जनता तक इसे पहुंचाने की बहुत जरूरत है। अवरेनेस फैलाने के लिए अब तक 15000 लोगों के साथ कंपनी कैंप कर चुकी हैं  जिसमें मुफ्त में दवाएं भी दी जाती हैं। इसकी अहमियत लोगों तक जल्द पहुंचाने के उद्द्येश्य से विद्दा बालन और सौरव गांगुली जैसे सेलेब्रिटीज भी इस मिशन के साथ जुड़ चुके है।


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