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ऑटो सेक्टर को स्लोडाउन और कोरोना की दोहरी मार, मैन्युफैक्चरर ने ढूंढ़े नए मौके

ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े MSME कारोबारी अनलॉक-1 में बेहद संकट के दौर से गुजर रहे हैं।
अपडेटेड Jul 01, 2020 पर 13:14  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े MSME कारोबारी अनलॉक-1 में बेहद संकट के दौर से गुजर रहे हैं। मजदूरों के पलायन की वजह से इस लेबर इंटेंसिव इंडस्ट्री में कारोबार लगभग ठप है। हालांकि कुछ कारोबारी इस संकट से जूझने के लिए नए तरीके भी अपना रहे हैं।


ऑटोमोबाइल सेक्टर में पिछले एक साल से स्लोडाउन चल ही रहा था कि कोरोना संकट ने पूरी इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी। लॉकडाउन के दौरान ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग ठप हो गई और इससे जुड़े घरेलू MSME कारोबारी बर्बादी के कगार पर पहुंच गए। लेकिन कुछ ने इसे चैलेंज के तौर पर लिया।


 जेड रहमान की फैक्ट्री इंडोप्लास्ट में मारुति, फोर्ड, महिन्द्रा, टाटा और ह्युंडई जैसी गाड़ियों के डैशबोर्ड में लगने वाले इलेक्ट्रिकल स्विच और पार्ट्स बनते थे। लेकिन फरवरी के अंत से तमाम ऑर्डर रुक गए और 10 मार्च तक सारे ऑर्डर कैंसिल हो गए जिससे करीब हर महीने 4 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा लेकिन अब ऑटो सेक्टर ना सही कोविड से निपटने में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बना कर ही कारोबार पटरी पर वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।


 लॉकडाउन के बाद फोर-व्हीलर के मुकाबले टू-व्हीलर सेगमेंट में रिवाइवल की उम्मीद जगी है। ग्रेटर नोएडा में ही हीरो मोटोकॉर्प के लिए एक्सेसरीज़, फ्रेम और स्टैंड की मैन्युफैक्चरिंग करने वाले जितेंद्र राणा भी लेबर नहीं होने की वजह से भारी मुश्किलों के दौर से गुजर रहे हैं।


देश में सालाना करीब 50 फीसदी ऑटो कंपोनेंट का इंपोर्ट होता है जबकि देश में ऑटो कंपोनेंट MSMEs में करीब 50 लाख लोग काम करते हैं और सालाना टर्नओवर करीब 57 बिलियन डॉलर का है लेकिन इस साल ना सिर्फ ऑटो कंपोनेंट बल्कि पूरे ऑटो सेक्टर में क्षमता के 50 परसेंट ही प्रोडक्शन की उम्मीद है। ऐसे में इस लेबर इंसेंटिव और बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने वाले सेक्टर के लिए एक और बड़ी सरकारी आर्थिक मदद की जरूरत है।




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