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टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और वॉलंटरी लाइसेंस से वैक्सीन सप्लाई बढ़ाने में मिलेगी सहायता: FICCI

इंडस्ट्री बॉडी ने अपने बयान में यह भी कहा है कि कम्पलसरी लाइसिंग से वैक्सीन का उत्पादन बहुत बढ़ने की संभावना नहीं है
अपडेटेड May 13, 2021 पर 16:15  |  स्रोत : Moneycontrol.com

फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कॉर्मस एंड इंडस्ट्र्री (FICCI) ने कहा है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और वॉलंटरी लाइसेसिंग से कोरोना वैक्सीन की सप्लाई में सुधार आ सकता है जबकि compulsory licences से इस समस्या का समाधान मुमकिन नहीं लगता।


अगर सरकार पेटेंट एक्ट के तहत compulsory licences की व्यवस्था लागू भी कर देती है तो भी नियर फ्यूचर में वैक्सीन के उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं होगी।


FICCI ने अपने बयान में आगे कहा है कि कोविड-19 वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने में सबसी बड़ी बाधा जरुरी कच्चे माल और दूसरे इनपुट्स की आपूर्ति में कमी  है।


बता दें कि देश में कोरोना की दूसरी लहर के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए वैक्सनीन से निपटने के लिए compulsory licences व्यवस्था लागू करने की मांग उठ रही है। जिसको देखते हुए FICCI ने अपना यह बयान दिया है।


अपने इस बयान में FICCI ने आगे कहा है कि अगर compulsory licences व्यवस्था को सही तरीके से नहीं लागू किया जाता है तो इससे वैक्सीन को डेवलप करने वाली कंपनियों में निराशा उत्पन्न हो सकती है। क्योंकि किसी भी दवा और वैक्सीन के विकास के शुरुआती दौर में डेवलपर कंपनी को शोध और विकास पर भारी खर्च करना होता है। इस  स्थिति में compulsory licences लागू करना शोध और विकास करने वाली कंपनियों के लिए निराशाजनक स्थिति हो सकती है।


इस बयान में आगे कहा गया है कि  टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और वॉलेट्ररी लाइसेसिंग से हमें सिर्फ फौरी तौर पर ही राहत नहीं मिलेगी बल्कि इससे देश को लंबी अवधि  में भी फायदा होगा।


FICCI का विश्वास है कि देश और देश के नागरिकों के लॉन्ग टर्म इन्टरेस्ट को देखते हुए भारत को जल्दबाजी में कोई एक पक्षीय निर्णय नहीं लेना चाहिए। इससे कोरोना की वर्तमान समस्या के बहुस्तरीय समाधान में मुश्किलें आ सकती हैं।


भारत के सार्वजानिक स्वास्थ्य के प्रबंधन  और रिसर्च और डेवलपमेंट करने वाली कंपनियों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करके ही कोई समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए।


गौरतलब है कि भारत और साउथ अफ्रीका ने कोविड-19 वैक्सीनों के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को अस्थाई तौर पर निलंबित करने की मांग की है। WTO से की गई इस मांग को अमेरिका से समर्थन भी मिला है लेकिन जर्मनी और दूसरे यूरोपियन देश इसके पक्ष में नही है।


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