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आवाज़ आंत्रप्रेन्योरः कचरे से निकला कमाई का रास्ता

प्रकाशित Sat, 14, 2018 पर 13:56  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

रिड्यूस, रियूज, रिसाइकल- ये स्लोगन बचपन से हमने पड़ा है, लेकिन हम में से कुछ ही इसे अपनी जिंदगी में ढालते हैं। इस जरूरी बात को नजरअंदाज करने का नतीजा ये है कि आज देश भर में लैंडफिल भरते जा रहें हैं और वेस्ट जेनेरेशन पर कोई रोक-थाम नहीं है। इसी बीच लेट्स रिसाइकल- इस नाम और मोटो के साथ अहमदाबाद बेस्ड ये स्टार्टअप वेस्ट मैनेजमेंट को ही अपना कारोबार बना रहा है।


जहां सड़कों पर बिखरे कूड़े को देख कर हम मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं इस कचरे से पैसा कमाने का जरिया ढूंढ निकाला अहमदाबाद के संदीप पटेल और उनके 3 दोस्तों ने। रिसाइकलिंग और वेस्ट मैनेजमेंट में रूची होने की वजह से  संदीप, ध्रुमिन, चिराग और रवी ने इस मार्केट पर कड़ी रिसर्च की। उन्होंने जाना कि इस कारोबार में इस बाजार में कई दिक्कतें हैं लेकिन इसके समाधान के लिए ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं है। बस यहीं से नेपरा रिसोर्स मैनेजमेंट की बाजार में अपने पैर जमाने की शुरुआत की। 


नेपरा अपने ब्रैंड लेट्स रिसाइकल के जरिए वेस्ट मैनेजमेंट का काम करती है। कंपनी सोसाइटी, टाउनशिप और कलेक्शन सेंटर के जरिए ड्राय वेस्ट इकट्टठा करती है। इसके बाद कचरे को प्रोसेसिंग प्लांट में लेकर जाया जाता है। यहां इसे मटिरियल के हिसाब से अलग कर दिया जाता है। इसके बाद प्लास्टिक, पेपर, ग्लास और मेटल जैसे सामान को साफ कर प्रोसेस किया जाता है। प्रोसेस किए गए इस मटीरियल को पेपर, प्लास्टिर, स्टेशनरी बनाने वाली मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को बेचा जाता है और यहीं से कंपनी रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा कमातीहै। कचरे को इकट्ठा करने के लिए कंपनी नगर निगम के साथ तो काम करती ही है साथ ही कूड़ा उठाने वालों की भी मदद लेती है। कंपनी इसके जरिए इस वर्ग के लोगों को ऑर्गनाइस्ड सेक्टर में लाने का प्रयास कर रही है।


लेट्स रिसाकल के कारोबार का मुख्य हिस्सा है सूखे कचरे को इकट्ठा करना है यही सबसे बड़ा चैलेंज भी रहा। भारत में ज्यादातर इलाकों की तरह ही अहमदाबाद के घरों में भी सूखे और गीले कचरे को अलग नहीं किया जाता। इसकी वजह से सेग्रीगेशन से लेकर प्रोसेसिंग तक सभी कामों में  बड़ी दिक्क्त आती है। लोगों के बीच कचरे को अलग करने के बारे में जागरूक करने में कंपनी ने कड़ी मशक्कत की। लेकिन चुनौतियां यहां खत्म नहीं होती। कारोबार पर निवेशकों और रिसाकलर को भरोसा दिलाना भी आसान नहीं रहा।


कंपनी ने 6 साल के अपने सफर में सबसे ज्यादा निवेश किया है इंफ्रास्ट्रकचर को खड़ा करने में। प्रोसेसिंग प्लांट में शुरुआती निवेश 1 करोड़ का रहा जो एक दिन में 100 मेट्रिक टक कचरे को प्रोसेस करने की क्षमता रखता है। कंपनी अपने साथ करीब 1800 वेस्ट पिकर को जोड़ चुकी है और 2500 कलेक्शन प्वाइंट सेटअप किए जा चुके हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मजबूती के साथ कंपनी रेवेनयू में भी अच्छी ग्रोथ देख रही है। 


लेट्स रिसाइकल अपनी पहुंच को इस साल 3 और अगल 3 सालों में 25 शेहरों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखती है। कंपनी ने इसके लिए आविष्कार और आशा इम्पैक्ट से 44 करोड़ रुपये की सीरीज बी फंडिंग भी जुटा ली है। कंपनी का मानना है इसी रफ्तार के साथ अगले 5 साल में कंपनी 1000 करोड़ का रेवेन्यू कमा लेगी।


भारत में हर दिन 1.5 लाख टन से ज्यादा सॉलिड वेस्ट जेनेरेट होता है लेकिन इसका सिर्फ 24 फीसदी ही प्रोसेस किया जाता है। इससे साफ है कि भारत में वेस्ट मैनेजमेंट की कितनी जरूरत है। ये जरूरत लेट्स रिसाइकल, ग्रीनपावर सिस्टम, इको-विश और वीरगोल्ड जैसे प्लेयर्स के लिए अच्छे भविष्य की तरफ इशारा करती है। साथ ही स्वच्छ भारत अभियान जैसे सरकारी प्रोग्राम इस इंडस्ट्री को बढ़ावा दे रहे हैं।