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भारत के GDP ग्रोथ को लेकर क्यों चल रही है बहस, कैसे गिनी जाती है GDP?

प्रकाशित Sun, 12, 2019 पर 10:29  |  स्रोत : Moneycontrol.com

नेशनल सैंपल सर्वे की एक हालिया रिपोर्ट से भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी और राष्ट्रीय आय के आकलन के सिस्टम को लेकर फिर से सवाल खड़े हुए हैं। ‘मिंट’ ने इस बाबत 8 मई, 2019 को सबसे पहले खबर बनाई। इस खबर के मुताबिक, नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन ने मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स के डेटाबेस एमसीए-21 में दर्ज कंपनियों के सर्वेक्षण के बाद पाया कि इनमें से लगभग 38 प्रतिशत कंपनियां वजूद में नहीं हैं या फिर उनका वर्गीकरण गलत तरीके से किया गया है, जबकि जीडीपी के आकलन में इन कंपनियों की गणना होती है।


इस विषय पर समझ बनाने के लिए मनीकंट्रोल हिंदी अपने पाठकों के लिए जरूरी बातों को सरल-सहज बनाकर पेश कर रहा है-


क्या है जीडीपी?



किसी देश की सीमा के भीतर एक खास अवधि जैसे कि एक साल या फिर एक तिमाही में तैयार वस्तुओं और सेवाओं के कुल मोल को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी यानी ग्रॉस डेमोस्टिक प्रोडक्ट कहा जाता है।


जीडीपी की गिनती कैसे होती है?


जीडीपी की गिनती तीन तरीके से हो सकती है- एक तरीका है उत्पादन को आधार मानकर गिनती करने का, दूसरा तरीका है आमदनी को आधार मानकर गिनती करने का और तीसरा तरीका है उपभोग को आधार मानकर गिनती करने का। और, अगर एकदम परिभाषा के दायरे में रहते हुए कहें तो गिनती का तरीका चाहे कोई भी अपनाया जाए लेकिन जीडीपी का मोल एक बराबर ही आना चाहिए। ऐसा इसलिए कि किसी एक व्यक्ति या इकाई का खर्च दरअसल साथ ही साथ दूसरे व्यक्ति या इकाई की आमदनी के रूप में होती है। मिसाल के लिए,  मान लीजिए कि आप अपनी रोजमर्रा के घरेलू खर्च के लिए किराने की दुकान पर सामान खरीदने जाते हैं। आप सामानों की खरीद पर जो रकम खर्च करेंगे वह रकम दुकानदार के लिए आमदनी हुई। इसी तरह, किसी कर्मचारी को मिलने वाला वेतन वो रकम है जो उसकी कंपनी अपनी तरफ से खर्च करती है।


आपूर्ति अथवा उत्पादन को आधार मानकर जीडीपी की गिनती कैसे करते हैं?


अर्थव्यवस्था के दायरे की सभी वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य से पता चल जाता है कि किसी देश की जीडीपी कितनी है।


आमदनी को आधार मानकर जीडीपी की गिनती कैसे करते हैं?


सरल शब्दों में कहें तो सभी लोगों की आय और निवेश में लगाई गई पूंजी से जो आमदनी हो रही है उसे जोड़ दें तो जीडीपी का योग निकल आएगा।


मांग अथवा व्यय को आधार मानकर जीडीपी की गिनती कैसे करते हैं?


सरकार लोक-कल्याण के उपायों और अपने कर्मचारियों के वेतन पर रकम खर्च करती है। उद्योग जगत निवेश और मजदूरी के भुगतान पर रकम खर्च करता है। उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की खरीद या बचत पर रकम खर्च करते हैं। अर्थव्यवस्था के दायरे में आने वाले तमाम व्यक्तियों या इकाइयों के जरिए खर्च की हुई इसी राशि का कुल योगफल किसी देश की जीडीपी होता है।


वास्तविक जीडीपी और नॉमिनल जीडीपी का क्या अर्थ है?


नॉमिनल जीडीपी की गणना वर्तमान मूल्यों के आधार पर होती है जबकि वास्तविक जीडीपी को मुद्रास्फीति के साथ एडजस्ट करके गिनते हैं।


बेस ईयर क्या होता है?


नेशनल अकाउंट का बेस ईयर विभिन्न सालों के बीच तुलनात्मक स्थिति को जानने के लिए चुना जाता है। इससे क्रयशक्ति में हुए बदलाव का पता चलता है और मुद्रास्फीति को समायोजित करते हुए आर्थिक वृद्धि की गिनती करना संभव हो पाता है।


नए सीरीज में बेस ईयर को 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया। नेशनल अकाउंट का हर डेटासेट दो सालों का जीडीपी आकलन देता है- एक तो 2011-12 का और एक चालू वर्ष का।


नए सीरीज की शुरूआत कब हुई?


जीडीपी के आकलन के तरीके में बदलाव का फैसला यूपीए-2 के शासन-काल में लिया गया। एनडीए सरकार ने डेटा का पहला सेट जारी किया- इसमें साल 2011-12 से देश की जीडीपी का स्तर और वृद्धि दर बताया गया है।


जीडीपी के आकलन की पुराने और नए तरीके में मुख्य अंतर क्या है?


पुराने तरीके में औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक) या कह लें फैक्ट्री में होने वाला उत्पादन विनिर्माण और व्यापारिक गतिविधियों के मापन का मुख्य साधन था। इसकी एक बड़ी सीमा ये थी कि इसमें उत्पादन की मात्रा का पता तो चल जाता था लेकिन मोल का पता नहीं चलता था। मिसाल के लिए, गिनती के पुराने तरीके में किसी संयंत्र में कितने मोटरसाइकिल तैयार हुए, इसका पता चलता था लेकिन फैक्ट्री में बनकर निकले मोटरसाइकिलों का मोल कितना है, ये पता नहीं चलता था।


इसी तरह पुराने तरीके में कम्युनिकेशन सेक्टर में जीडीपी की गिनती के लिए टेलीकॉम सब्सक्राइबर बेस का इस्तेमाल होता था जबकि गिनती के नए तरीके में संवाद-माध्यम का वास्तविक उपयोग के मिनटों की गिनती की जाती है।


अब क्या होगा?


पुराने तरीके में जीडीपी का पहला आकलन औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक यानी आईआईपी पर आधारित होता था। इसे हर दो साल पर उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण यानी एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज के आंकड़ों के हिसाब से अपडेट किया जाता था। एएसआई से सिर्फ इतना ही पता चलता था कि फैक्ट्री एक्ट के तहत पंजीकृत फर्मों में जिन चीजों का उत्पादन हुआ उनका मोल कितना है।


अब कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के एमसीए 21 रिकार्ड का इस्तेमाल होता है। इसमें लाखों के कंपनियों के बैलेंस शीट्स के ब्यौरे दर्ज हैं। इन्हीं ब्यौरों का इस्तेमाल किया जाता है।


राष्ट्रीय आय की गणना के लिए एमसीए 21 रिकार्ड का इस्तेमाल करने से संगठित व्यावसायिक गतिविधियों का एक ऐसा हिस्सा उजागर हुआ है तो पहले बड़े हद तक अनदेखा ही रह जाता था। यह कारपोरेट सेंगमेंट का सबसे निचला हिस्सा है। इस हिस्से में वैसी कंपनियां शामिल हैं जो स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड नहीं हैं और ठीक इसी कारण से राष्ट्रीय आय के आकलन में हमेशा गिनती से बाहर रह जाती थीं।


सकल मूल्य वर्धित यानी ग्रॉस वैल्यू एडेड क्या है?


गिनती के नए तरीके में जीवीए को आधार माना जाता है जबकि गिनती के पुराने तरीके में मुख्य जोर उत्पादन की मात्रा पर दिया जाता था।
जीडीपी से टैक्स को घटा देने पर जीवीए निकलता है। किसी अर्थव्यवस्था के भीतर जिन सेवाओं और वस्तुओं का एक खास में उत्पादन हुआ उनके कुल मोल को जानने का जीवीए कहीं ज्यादा विश्वसनीय साधन है।


गणना के पुराने तरीके में आईआईपी विनिर्माण और व्यापारिक गतिविधियों के मापन का मुख्य साधन था। समस्या ये थी कि इससे ये तो पता चलता था कि किसी फर्म में कुल कितनी वस्तु-इकाइयों का उत्पादन हुआ लेकिन दो वस्तु-इकाइयों जैसे कि लक्जरी कार और एकदम शुरुआती स्तर के हैचबैक के मूल्यों के बीच क्या अंतर है। संभव है कि किसी फैक्ट्री में बनने वाली वस्तु की तादाद एक खास अवधि में ठहराव का शिकार रही हो लेकिन उन वस्तुओं के मूल्य में कई गुणे का इजाफा हुआ हो।


मान लीजिए कोई कंपनी हर साल कारों की एक सी तादाद बेच रही है लेकिन हर साल कार की क्वालिटी में सुधार कर देती है तो कार के दाम बढ़ेंगे। यहां कार की जगह हम कंप्यूटर का उदाहरण लें तो ज्यादा कारगर होगा। अगर हम सिर्फ उत्पादन आधारित गणना के तरीके पर टिके रहें तो इस तरीके से हम यह कत्तई नहीं पकड़ पाएंगे कि साल दर साल कंप्यूटर में क्या नई चीजें जोड़ी गईं, कंप्यूटर सरीखे उत्पादों और उनसे जुड़ी व्यापारिक गतिविधियों में कितना मूल्य वर्धन हुआ।


जीवीए को आधार मानने वाली गणना-पद्धति में वस्तुओं के मूल्य-वर्धन का भी ध्यान रखा जाता है और मार्केटिंग सरीखी आर्थिक गतिविधियों का भी। फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुडस् के मामले में मार्केटिंग सरीखी गतिविधियों बड़े मोल की होती हैं।


जीडीपी डेटा को लेकर हाल में क्या विवाद उठा है?


एक खबर के मुताबिक एनएसएसओ के टेक्निकल रिपोर्ट ऑन सर्विस सेक्टर इंटरप्राइजेज इन इंडिया नाम की हाल की रिपोर्ट से पता चलता है कि एमसीए-21 डेटाबेस में दर्ज 38 प्रतिशत कंपनियां या तो वजूद में ही नहीं हैं या फिर उनका वर्गीकरण गलत तरीके से किया गया है। इससे सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या भारत अपने जीडीपी और वृद्धि दर का आकलन वास्तविकता से कहीं ज्यादा करता आ रहा था।


सरकार की इस मसले पर क्या प्रतिक्रिया रही?


सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि एक आधिकारिक समिति सर्विस सेक्टर के इंटरप्राइजेज पर केंद्रित एनएसएसओ की टेक्निकल रिपोर्ट की समीक्षा करेगी। मंत्रालय का कहना है कि एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज के बरक्स एमसीए डेटाबेस की कवरेज, क्वालिटी और सम-सामयिकता पर नेशनल अकाउंटस् स्टैटिस्टिक्स की परामर्श समिति में ब्यौरेवार चर्चा हुई है और चर्चा के बाद ही उसे स्वीकार किया गया है।


केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय नए बेस रिवीजन को 2017-18 तक अपडेट करने की कवायद में लगा है। सांख्यिकी मंत्रालय ने इसी मकसद से एनएसएसओ की टेक्निकल रिपोर्ट मंगाई थी।


इन कंपनियों के वजूद में ना होने की क्या वजहें हो सकती हैं?


इन कंपनियों के वजूद में ना होने का एक संभावित कारण तो यही हो सकता है कि ये कंपनियां सिर्फ कागज पर चलती हों यानी शेल कंपनियां हों। सरकार को पता चला है कि भारत में पंजीकृत हर तीन कंपनी में एक कंपनी कामकाजी हालत में नहीं है और 28 फरवरी 2019 को कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने शेल कंपनियों या कह लें कागजी कंपनियों पर कार्रवाई करने की योजना के तहत 6.2 लाख कंपनियों को आधिकारिक दस्तावेज से हटा दिया।


ठप पड़ी 6.7 लाख कंपनियों में 10,640 कंपनियों को खत्म मान लिया गया, 6.2 लाख कंपनियों को कामकाजी हालत में ना मानते हुए आधिकारिक दस्तावेज से हटाया गया, 22,532 कंपनियों को अन्य कंपनियों के साथ नत्थी किया गया, 10,086 कंपनियों को लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप में बदला गया और 4,794 को एलएलपी में बदलकर खत्म कर दिया गया।


पंजीकृत 18.6 लाख कंपनियों में 6.22 लाख ठप मानकर सूची से हटाई गई।  28 फरवरी 2019 तक सूची से हटाई गई कंपनियों की संख्या कुल पंजीकृत कंपनियों की संख्या का 33 प्रतिशत थी।


किसी कंपनी का नाम आधिकारिक दस्तावेज से कब हटाया जाता है?


कंपनी एक्ट-2013 की धारा 248 के मुताबिक अगर कोई कंपनी रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की सूची में नाम दर्ज होने के एक साल के भीतर व्यवसाय शुरू नहीं कर पाती या फिर ऐसी पंजीकृत कंपनी ने तीन सालों तक अपना कामकाज नहीं किया है तो उसका नाम रिकॉर्ड से हटाया जा सकता है।


रिकॉर्ड से कंपनियों को हटाने का अभी जो काम किया गया है वो एक अभियान का हिस्सा है। इस अभियान का मकसद वैसी व्यावसायिक इकाइयों को समाप्त करना है जो अब आर्थिक गतिविधियों में हिस्सेदार नहीं हैं और व्यवस्था पर एक बोझ समान हो गई हैं। कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय यह जानने के लिए डेटा की जांच कर रहा है कि कहीं कोई कंपनी मनी-लॉन्डरिंग या टैक्स-चोरी जैसी गतिविधियों में तो लिप्त नहीं।


कारपोरेट मंत्रालय के डेटा से यह भी पता चलता है कि तकरीबन 11.9 लाख यानी दो तिहाई कंपनियां चालू हालत में हैं। जो कंपनियां चालू हालत में हैं वो सामान्य तौर पर अपना व्यापारिक-व्यावसायिक कामकाज करती हैं, आय अर्जित करती हैं और फाइनेंशियल स्टेटमेंट जमा करने जैसे जरूरी दायित्व का निर्वाह करती हैं। कंपनियों का ठप होना या फिर बंद हो जाना भी एक वजह हो सकता है जो एमसीए 21 डेटाबेस पर केंद्रित एनएसएसओ की टेक्निकल रिपोर्ट में 30 फीसद से ज्यादा कंपनियां गायब नजर आ रही हैं।


इन ना-मौजूद कंपनियों का जीडीपी की गणना पर असर को लेकर सरकार का क्या कहना है?


सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि कारपोरेट सेक्टर के बाबत मौजूदा जीडीपी-जीवीए पर कोई असर नहीं होता क्योंकि चुकता पूंजी को आधार मानते हुए कारपोरेट फाइलिंग को एडजस्ट करने में पर्याप्त ध्यान रखा गया है। मंत्रालय का कहना है किसी आंकड़े को जारी करते समय उस वक्त तक मौजूद डेटा के मुताबिक जीडीपी-जीवीए का पुनरीक्षण किया गया और इसके बाद ही आंकड़े जारी किए गए।


मसले पर विशेषज्ञों का क्या कहना है?


पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरह की बातें कही जा रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ना-मौजूद कंपनियों के कारण जीडीपी और वृद्धि दर का आकलन बढ़ा हुआ आया हो सकता है जबकि कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जीडीपी और राष्ट्रीय आय की गणना की व्यय वाली पद्धति के सहारे वस्तुओं में हुए मूल्यवर्धन को खर्च के मूल स्तर पर ही जोड़ लिया जाता है। मिसाल के लिए, संभव है कि किसी कंपनी ने टैक्स में चोरी के मकसद से अपनी शेल सब्सिडरी खड़ी की हो और शेल कंपनी सरकारी कार्रवाई के डर में बंद कर दी गई हो लेकिन शेल कंपनी ने जो मूल्यवर्धन और व्यय किया है उसे खर्च के विभिन्न स्तरों पर आकलित कर लिया जाता है।


गणना के नए तरीके के इस्तेमाल के सहारे जीडीपी के आकलन को लेकर आलोचना में अन्य क्या बातें कही जा रही हैं?


एक बड़ी आलोचना बैक सीरीज को लेकर है। बैक सीरीज 2018 के नवंबर में आई। बैक सीरीज गणना के नए और पुराने फॉर्मूले के बीच एक कड़ी का काम करती है। बैक सीरीज का मकसद है- नए फॉर्मूले के सहारे नेशनल अकाउंट को अपडेट करने के क्रम में क्रमवार विभिन्न वर्षों के बीच आंकड़े के घट-बढ़ की तुलना करना और बेहतर पूर्वानुमान पर पहुंचना।


चूंकि डेटा सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है सो कुछ क्षेत्रों के लिए तुलन-संलयन पद्धति (स्पलाइसिंग मेथ्ड) या कह लें बेस इयर 2011-12 के आकलन में जो अनुपात नजर आया है, उसका इस्तेमाल पिछले सालों की जीडीपी/राष्ट्रीय आय की गणना के लिए किया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि आप एमसीए 21 डेटा को बीते सालों के लिए सही मानकर पर कैसे लागू कर सकते हैं जबकि डेटा तैयार होना ही शुरु हुआ साल 2008 में और बाद के बरसों में उसमें कई चरणों में बदलाव भी हुए।


आखिर आलोचना क्यों हो रही है?


पहले अनुमान लगाया गया था कि साल 2011-12 में भारत की वृद्धि दर 10.3 प्रतिशत यानी दहाई अंकों में जा पहुंची। लेकिन अब इसमें संशोधन करते हुए वृद्धि दर को 8.5 प्रतिशत कर दिया गया है, ऐसा नए आकलन के हिसाब से किया गया है।


इसी तरह साल 2005-06, 2006-07 और 2007-08 के लिए पहले वास्तविक या कहे लें मुद्रास्फीति-समायोजित जीडीपी वृद्धि दर क्रमशः 9.3 फीसदी, 9.3 फीसदी और 9.8 फीसदी थी जिसे संशोधित करते हुए 9.9 फीसदी, 8.1 फीसदी और 7.7 फीसदी कर दिया गया है।


नए सीरीज के मुताबिक साल 2009-10 में वृद्धि दर घटकर 3.1 प्रतिशत हो गई जबकि पिछले आकलन में इसे 3.9 प्रतिशत बताया गया था। नए आंकड़े के मुताबिक साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर पिछले अनुमान की तुलना में कहीं ज्यादा असर हुआ थी।


जीडीपी की वृद्धि दर में तेज गिरावट के क्या कारण हैं?


सरकार के मुताबिक अर्थव्यवस्था के प्राथमिक यानी कृषि), द्वितीयक यानी विनिर्माण और तृतीयक यानी सेवा क्षेत्र को प्रभावित करने वाले बहुत सी चीजों को पुराने आकलन में वास्तविक से ज्यादा करके गिना गया था।


नए आकलन के मुताबिक अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में वृद्धि दर साल 2005-06 के 5 प्रतिशत की तुलना में साल 2011-12 में घटकर 2 प्रतिशत हो गई लेकिन पिछले आकलन में बताया गया था कि प्राथमिक क्षेत्र की वृद्धि दर साल 2005-06 के 4.6 प्रतिशत से घटकर साल 2011-12 में  4.4 प्रतिशत हुई।


इसी तरह नए आकलन के मुताबिक द्वितीयक क्षेत्र में वृद्धि दर साल 2005-06 के 10.2 प्रतिशत से घटकर साल 2011-12 में 8.5 प्रतिशत हुई है जबकि पिछले आकलन में कहा गया था कि द्वितीयक क्षेत्र की वृद्धि दर इस अवधि में 10.7 प्रतिशत से घटकर 8.5 प्रतिशत हुई है।


बैक सीरीज वाले नए आकलन के मुताबिक अर्थव्यवस्था के तृतीयक क्षेत्र में वृद्धि दर साल 2005-06 के 9.1 प्रतिशत से घटकर साल 2011-12 में 5.9 प्रतिशत हुई है जबकि पुराने आकलन में कहा गया था कि इस अवधि में तृतीयक क्षेत्र में वृद्धि दर 10.9 प्रतिशत से घटकर 6.9 प्रतिशत हुआ है।


जीडीपी के आंकड़ों में आखिर इतना ज्यादा अन्तर क्यों ?


आंकड़ों में अंतर की एक वजह जीडीपी डिफ्लेटर मेथड में बदलाव भी हो सकता है। जीडीपी डिफ्लेटर्स मूल्य निर्देशांक होते हैं। इनका इस्तेमाल मुद्रास्फीति के हिसाब से जीडीपी को समायोजित करके आकलित करने में किया जाता है। नए आकलन में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग जीडीपी डिफ्लेटर्स इस्तेमाल किए गए हैं।


भारत में अनौपचारिक क्षेत्र और काले धन से जुड़ी अर्थव्यवस्था नियमन के दायरे से बाहर चला करती है तो इन क्षेत्रों से जीडीपी डेटा का क्या रिश्ता बनता है?


अधिकारियों के मुताबिक जीडीपी सीरिज में अनौपचारिक क्षेत्र और कालेधन पर आधारित अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखा गया है क्योंकि परिवारों के सर्वे के सहारे जो आंकड़े जुटाए गए हैं उनमें संपदा- इसके लिए डेट और इन्वेस्टमेंट सर्वे का सहारा लिया गया है, परिव्यय और संस्थापना संबंधी गतिविधियों से जुड़े तथ्यों का संकलन हुआ है। काले धन को मूल्यवर्धन की श्रेणी में नहीं रख सकते। यहां कालेधन का मतलब हुआ- संपदा की वह मात्रा जिस पर टैक्स आयद होना था लेकिन टैक्स के रूप में अदायगी नहीं हुई। ऐसे धन के बारे में जान पाना बहुत मुश्किल है।


इस सिलसिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के एतबार से क्या बातें नजर आती हैं?


जीडीपी की गणना के पहले वाले तरीके में मुख्य रूप से खेतिहर उत्पादन की गिनती के सहारे कृषि-क्षेत्र की आय का आकलन किया जाता था। गणना के नए तरीके में दायरा बढ़ा है और अब कृषि-क्षेत्र में हुए मूल्यवर्धन की भी गिनती हो रही है। आधिकारिक सांख्यिकीविद् का कहना है कि पशुपालन से जुड़े आंकड़ों का गणना की नई पद्धति में कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। नयी पद्धति में मांस के उप-उत्पाद जैसे सिर और टांग, फैट, स्किन, पशु के खाने योग्य ग्लैंडस् आदि के मोल की गिनती करना भी संभव हो गया है।


जीडीपी की गिनती में लेबर इनकम का आकलन कैसे होता है?


जीडीपी की गिनती के पहले वाले तरीके में हर तरह के श्रम को समान माना जाता था। गिनती के नये तरीके में एक नई धारणा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे इफेक्टिव लेबर इनपुट का नाम दिया गया है। इसके तहत विभिन्न कोटि के श्रम को अलग-अलग वेटेज दिया जाता है, देखा जाता है कि कौन व्यक्ति ओनर है और पारिश्रमिक देकर रखा हुआ पेशेवर अथवा सहायक।


ट्रेडिंग से जुड़ी सेवाओं के आकलन के बाबत क्या बातें कही जा सकती हैं?


नयी सीरीज में एनएसएसओ के 2011-12 के इस्टैब्लिसमेंट सर्वे का इस्तेमाल किया गया है। पहले की सीरिज में 1999 के सर्वे के डेटा का इस्तेमाल किया जाता था। हाल के सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि ट्रेड में मूल्यवर्धन पुरानी सीरीज में दर्शाई गई स्थिति की तुलना में काफी कम रहा है। पुरानी सीरीज में 1999 के सर्वे के डेटा का उपयोग किया गया था।


फाइनेंशियल सेक्टर की आय की गणना कैसे की जाती है?


आधिकारिक स्टैटिस्टिशियंस का कहना है कि नई सीरिज में फाइनेंशियल सेक्टर में हुए मूल्य-वर्धन और आर्थिक गतिविधियों को दर्ज कर पाने की गुंजाइश ज्यादा व्यापक हुई है। पहले की सीरीज चंद म्युचुअल फंड्स- मुख्य रुप से यूटीआई, तक सीमित थी और आरबीआई के दस्तावेजों में दर्ज नॉन-गवर्नमेंट नॉन-बैकिंग फाइनेंस कंपनियों के आय की ही गणना हो पाती थी।


नई सीरीज में दायरा बढ़ा है और अब इसके भीतर स्टॉक ब्रोकर, स्टॉक एक्सचेंज, एसेट मैनेजमेंट कंपनी, म्युचुअल फंड और पेंशन फंड के साथ ही साथ सेबी, पीएफआरडीए और आईआरडीए सरीखे नियामक संस्थाओं के आय की भी गिनती होती है।


स्थानीय निकाय और स्वायत्त संस्थाओं की आय की गणना के बारे में क्या बातें कही जा सकती हैं?


पहले वाले तरीके में स्थानीय निकायों और स्वायत्त संस्थाओं की आर्थिक गतिविधियों का आकलन केवल चार राज्यों-दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मेघालय तथा उत्तरप्रदेश के सात स्वायत् संस्थाओं और स्थानीय निकायों से हासिल सूचनाओं के आधार पर होता था। नई सीरीज में दायरा बढ़ा है और इस बढ़े हुए दायरे में इन संस्थाओं को प्रदत्त-हस्तांतरित 60 प्रतिशत फंड की गिनती हो रही है।


जीडीपी डेटा कब जारी होते हैं, इनका पुनरावलोकन कैसे होता है?


केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय हर साल दो माह के अंतराल से जीडीपी का तिमाही आकलन जारी करता है। कार्यालय हर साल जनवरी के पहले हफ्ते और फरवरी के आखिरी हफ्ते में वार्षिक अग्रिम अनुमान जारी करता है। नेशनल अकाउंट का तीन साल की अवधि में कई बार पुनरावलोकन होता है। इसमें नए डेटा का इस्तेमाल किया जाता है।


पहला प्रोविजनल वार्षिक अनुमान मई महीने में कामकाज की आखिरी तारीख को जारी होता है। साल 2018-19 के लिए प्रोविजनल जीडीपी एस्टीमेट 31 मई, 2019 को जारी होंगे।


बाद में इसे नए आंकड़ों के सहारे संशोधित किया जाएगा और साल 2018-19 के लिए पहला संशोधित अनुमान 2020 की जनवरी में अंतिम वर्किंग डे को जारी होगा। इसका नए डेटा के सहारे फिर से पुनरावलोकन किया जाएगा और दूसरा संशोधित अनुमान 2021 की जनवरी के आखिरी वर्किंग डे को जारी होगा।


किसी भी साल के प्रोविजनल एस्टीमेट के जारी होने से पहले आइआइपी, थोक मूल्य सूचकांक, कोर सेक्टर यानी स्टील, सीमेंट बिजली आदि के आंकड़े, राजस्व-व्यय, जीएसडी डेटा, आयात-निर्यात संबंधी ट्रेड टेडा, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आदि को ध्यान में रखते हुए आकलन किया जाता है।


सूचकांकों पर आधारित आकलन को संबंधित क्षेत्रों के डेटा के उपलब्ध होने पर फिर से देखा-परखा जाता है। तीसरे संशोधित अनुमान के वक्त तक डेटा स्रोत अपने कवरेज और पूर्णता के लिहाज से अंतिम मुकाम तक पहुंच चुका होता है सो इससे आगे पुनरावलोकन नहीं होता।