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क्या YES Bank पूरे बैंकिंग सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है?

प्रकाशित Wed, 01, 2019 पर 14:42  |  स्रोत : Moneycontrol.com

यस बैंक में स्ट्रेस्ड लोन की वापसी हो रही है। इससे यह सवाल पैदा हो रहा है कि क्या यस बैंक पूरे भारतीय बैंकिंग सिस्टम को एक खतरे की पूर्वसूचना दे रहा है?


गुजरे कुछ महीनों में इस बात को लेकर सहमति बनी है कि स्ट्रेस्ड एसेट को पहचानने का दौर भारत में खत्म हो चुका है और अब इनके निपटारे को लेकर फोकस किया जाना चाहिए। अपनी पिछली फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पूरे बैंकिंग सिस्टम में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स रेशियो के नीचे आने का अनुमान जताया था।


एक साल के भीतर कैसे गड़बड़ हो गया मामला?


अब यस बैंक ने 10,000 करोड़ रुपए के लोन वॉचलिस्ट में डाल दिए हैं। साथ ही बैंक ने सक्रियता दिखाते हुए इन स्ट्रेस्ड लेकिन परफॉर्मिंग खातों के लिए एक आकस्मिक 2,100 करोड़ रुपए की प्रोविजनिंग भी कर दी है। मॉर्गन स्टेनली के मुताबिक, बैंक का यह कदम फिर भी काफी आशावादी लग रहा है क्योंकि यस बैंक की लोन बुक का 35 फीसदी हिस्सा स्ट्रेस्ड सेक्टर से जुड़ा हुआ है। लोन्स को वॉचलिस्ट में डालने की शुरुआत बैंक को तब करनी पड़ी जबकि मार्च क्वॉर्टर में बैंक में 3,481 करोड़ रुपए के नए लोन्स के बैड लोन में तब्दील होने की बात सामने आई। इन लोन्स में एक-तिहाई हिस्सा आईएलएंडएफएस और जेट एयरवेज का था। ऐसे में अहम सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कैसे एक साल के भीतर चीजें गड़बड़ा गईं क्योंकि आरबीआई के ऑडिट में यस बैंक को फाइनेंशियल ईयर 2017-18 में क्लीन चिट दी गई थी।


यहां हमें यह समझना होगा कि वॉचलिस्ट से बेहद सावधानी से निपटना होता है। हालांकि, ये परफॉर्मिंग एसेट्स होती हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि खराब दौर शुरू होते ही इनमें मुश्किलें पैदा होने लगती हैं। फाइनेंशियल ईयर 2015-16 के लिए एक्सिस बैंक ने 22,600 करोड़ रुपए की वॉचलिस्ट तय की थी। बैंक ने कहा था कि इसका केवल 60 फीसदी हिस्सा ही बैड लोन में तब्दील होगा। लेकिन, मैक्वायरी के मुताबिक, लगातार नए लोन जुड़ने से यह अपने मूल आकार के 1.2 गुने पर पहुंच गया।


ऐसे में यस बैंक मामले से मोटे तौर पर फाइनेंशियल सिस्टम में मौजूद गड़बड़ियों के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। होम फाइनेंस, नॉन-बैंकिंग फाइनेंस, कंस्ट्रक्शन, एविएशन और मीडिया जैसे कई सेक्टरों में कई डिफॉल्ट्स और डेट रेटिंग के डाउनग्रेड होने की घटनाएं सामने आई हैं। कर्ज देने वाले संस्थान जिनमें से कुछ के पास गिरवी में ऐसी संपत्तियां हैं जिनका बिकना आसान नहीं है, उन्होंने एसेट्स बेचकर रकम चुकाने की कोशिश में लगे कर्जदारों के साथ एग्रीमेंट किए हैं। हालांकि, न तो ये संपत्तियां बिक रही हैं न ही कर्जदार पैसा चुका पा रहे हैं। दूसरी ओर, मौजूदा दौर में इकोनॉमिक ग्रोथ उतनी मजबूत नहीं है जिससे स्ट्रेस्ड सेक्टर तेजी से वापसी कर पाएं।


निश्चित तौर पर, यह सब बैंकिंग स्टॉक्स की दौड़ में नजर नहीं आया। पिछले एक साल में बैंक निफ्टी ने बेंचमार्क निफ्टी के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया है। लेकिन, निवेशकों को सतर्क रहना जरूरी है। हाल की घटनाएं बैंकों और म्यूचुअल फंड्स दोनों के आक्रामक तौर पर कर्ज देने की गतिविधि और खराब रिस्क मैनेजमेंट नीतियों पर रोशनी डालती हैं। गुजरे कुछ वक्त में कई बैंकों ने रिटेल कर्ज बांटे हैं, लेकिन कई बैंकों का अभी भी एक बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट लोन का है।


क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और एनालिस्टों की नाकामी


इन घटनाओं से एक और बात पता चलती है- क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और एनालिस्टों की नाकामी। ये गड़बड़ियां पकड़ने और वक्त पर खतरे की घंटी बजाने में नाकाम रहे। ऐसे मॉडल में, जहां रेटिंग करवाने वाली कंपनी भुगतान करती है, रेटिंग एजेंसियों के गड़बड़ियों की उपेक्षा करना स्वाभाविक है। एनालिस्ट आमतौर पर एक भीड़ के जैसे व्यवहार करते हैं और मैनेजमेंट कमेंटरी पर कोई सवाल नहीं उठाते हैं।


निश्चित तौर पर, एसेट क्वॉलिटी और दूसरे आंकड़ों के लिए एनालिस्ट्स को कंपनी के मैनेजमेंट पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन, जब सार्वजनिक रूप से जानकारी उपलब्ध होती है वे अक्सर तब उन गड़बड़ियों को पकड़ने में नाकाम रहते हैं। स्वतंत्र एनालिस्ट हेमिंद्र हजारी इस उदाहरण में इस चीज का जिक्र करते हैं, जहां एक कंपनी एक बैंक का कर्ज तो चुकाती रहती है, जबकि वह दूसरे बैंकों के कर्जों पर डिफॉल्ट कर जाती है। मैक्वायरी के एनालिस्टों ने यस बैंक की अर्निंग नोट में लिखा- हमें स्वीकार करना होगा कि हमने स्ट्रक्चर्ड फाइनेंस में जोखिमों को नजरअंदाज किया। हमने गलत फैसला लिया।


इससे और अधिक पारदर्शिता की जरूरत का भी पता चलता है। मसलन, आरबीआई के 2017-18 में यस बैंक को क्लीन चिट देने और बैंक के वॉचलिस्ट में लोन डालने में विरोधाभास दिखाई देता है। यस बैंक ने आरबीआई के तय किए सभी मानकों को पूरा किया। ऐसे में इनवेस्टरों को अंदर की बात तब तक पता नहीं चलेगी जब तक आरबीआई अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करेगा।