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Coronavirus fallout: लॉकडाउन के बीच फल किसानों को 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान

जब भी कोई अनिश्चितता आती है, तो लोग सबसे आवश्यक वस्तुओं का स्टॉक पूरा करते हैं, फल उस श्रेणी में नहीं आते हैं
अपडेटेड Apr 06, 2020 पर 12:38  |  स्रोत : Moneycontrol.com

कोरोना वायरस की मार से पूरी दुनिया जूझ रही है। इससे आर्थिक हालात भी बिगड़ रहे हैं। कई ऐसे सेक्टर्स हैं, जिन्हें कोरोना वायरस से तगड़ी मार पड़ी है। कोरोना वायरस ने फल किसानों का आर्थिक जायाक बिगाड़ दिया है। देश में कोरोना वायरस के खौफ की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है। इससे ट्रांसपोर्ट पर असर पड़ा है। फल किसानों को इस लॉकडाउन की वजह से 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।


कई किसानों के लिए मार्च और मई का महीना बेहतर होता है, क्योंकि इसी महीने में वो अपना माल लेकर थोक बाजार में जाते हैं। वहां से फिर वो उपभोक्ताओं के लिए पहुंचता है। लेकिन इस साल ऐसा कुछ भी नहीं है।


महाराष्ट्र के जलगांव जिले के सावदा के एक केला उत्पादक किसान वैभव महाजन कहते हैं कि हम केले की आपूर्ति के लिए तैयार हैं। हमें शहरों में ले जाने के लिए ट्रक नहीं मिल रहे हैं। महाजान ने अपने बयान में आगे कहा कि केले के दाम पिछले दो हफ्तों में 60 फीसदी से घटकर 400 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए हैं। लेकिन अभी कोई वितरक ट्रांसपोर्ट नहीं मिलने के कारण कोई खरीदार नहीं मिल रहा है।


जलगांव जिले में देश में सबसे अधिक केले की खेती होती है। फलों के साथ तकरीबन 45,000 हेक्टेयर खेती योग्य भूमि है। इससे पहले जलगांव से जयपुर के लिए ट्रक भाड़ा 45,000 रुपये लगता था, जो कि अब बढ़कर 85,000 रुपये हो गया है।


फलों को ऊंची कीमतों में बेचा जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा फायदा बिचौलिये उठा रहे हैं। क्षेत्र भर के किसान अपनी उपज बेचने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं। यहां तक कि ट्रक वाले भी केला जैसे फलों को लेकर जाने के लिए मना कर रहे हैं।  
फिलहाल मौजूदा हालात से छोटे किसानों पर सबसे अधिक मार पड़ेगी। क्योंकि उन लोगों ने खेती के लिए भी लोन लिया हुआ है। अगर सीधे शब्दों में कहें तो उनके पास इतने पैसे भी नहीं है कि वो लोन चुका सकें। साथ ही अगले साल के लिए उनके पास अतिरिक्त पैसे भी नहीं हैं।


केला उत्पादक किसानों की तरह, महाराष्ट्र के अमरावती जिले के किसानों को संतरे बेचने में भी कई तरह की कठिनियों का सामना करना पड़ा रहा है।


एक संतरा किसान उत्पादक के मुताबिक, कुछ हफ्ते पहले संतरा की कीमतें 35 रुपये प्रति किलो ग्राम से घटकर 15 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई हैं। अमरावती और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के पास तकरीबन 1,000 टन से अधिक संतरे हैं। लेकिन ट्रांसपोर्ट की सही व्यवस्था नहीं होने के चलते माल गोदाम में पड़ा हुआ है।


किसानों का कहना है कि संतरे की shelf life (सामग्री के भंडार और उपयोग होने तक की अवधि) दो हफ्ते की होती है। गर सही समय में संतरे की बिक्री नहीं हुई तो किसानों को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ेगा।


बता दें कि भारत से संतरे यूरोपीय देशों को भी निर्यात किए जाते हैं, जिस पर लॉकडाउन के दौरान पाबंदी लगा दी गई है। अगर ऐसे ही हालात रहे तो तकरीबन 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान की संभावना जताई जा रही है।


अमरावती महाराष्ट्र के विर्दभ का एक हिस्सा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या पूरे देश में बहुचर्चित है। हालांकि अमरावती एक ऐसी जगह है जहां के किसान आमतौर पर फसल खराब होने या नुकासन होने पर ऐसा कोई कठोर कदम नहीं उठाते हैं। लेकिन कुछ किसानों को डर है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो अमरावती से भी किसानों के आत्महत्या की खबरें आ सकती हैं।  


ऐसे ही हालात अंगूर और सेब के फल उत्पादक किसानों के साथ है। कुछ अंगूर, केला, सेब, संतरा उत्पादक किसान अपनी फसलों को फेंक रहे हैं, क्योंकि 21 दिन के लॉकडाउन के चलते फल खराब हो जाएंगे। 


कुल मिलाकर देश में कोरोना वायरस की वजह से फल किसानों को तगड़ा नुकासन होने की संभावना है।


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