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IBC के 7 संशोधनों पर कैबिनेट की मुहर, 330 दिनों में करना होगा मामले का निपटारा

कैबिनेट ने इनसॉल्वेंसी कोड के 7 संशोधनों को पास किया है। अब इसे संसद में पेश किया जाएगा
अपडेटेड Jul 17, 2019 पर 17:51  |  स्रोत : Moneycontrol.com

सरकार ने बुधवार को इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के संशोधनों को पास कर दिया। इसी के  साथ ही कंपनियों के रेस्क्यू के लिए सख्ती से टाइमलाइन लागू किया जाएगा। साथ ही दिवालिया हो चुकी कंपनी की वैल्यू को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।


कैबिनेट ने इनसॉल्वेंसी कोड के 7 संशोधनों को पास किया है। अब इसे संसद में पेश किया जाएगा। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने बताया कि इन संशोधनों का मकसद कॉरपोरेट रेस्क्यू फ्रेमवर्क के अंतर को खत्म करना है।


IBC में संशोधन के साथ ही किसी कंपनी के बैंकरप्सी रेज्योल्यूशन के लिए 330 दिनों की सीमा तय कर दी गई है। इसमें कानूनी लड़ाई और दूसरी सभी न्यायिक प्रक्रिया शामिल हैं।


फिलहाल IBC के तहत रेज्योल्यूशन प्लान क्लियर करने के लिए 270 दिनों का वक्त दिया गया है। लेकिन अदालत में काफी वक्त लग जाता है। प्रमोटर्स आक्रामक ढंग से अपने केस की पैरवी करते हैं और कंपनी पर अपना कंट्रोल खत्म होने से रोकना चाहते हैं। हालांकि कई मामलों में काफी वक्त लग जाता है। 
संशोधन में फाइनेंशियल क्रेडिटर्स और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के अधिकारों में साफ-साफ फर्क बताया गया है। फाइनेंशियल क्रेडिटर्स रेस्क्यू प्लान के पक्ष में वोट नहीं करते हैं।


किन्हें मिलेगा जल्दी पेमेंट


इस प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि कोड में अपनी हाइरैरकी के हिसाब से लिक्विडेशन के बाद पेमेंट की जाएगी। IBC में उन्हें ज्यादा प्राथमिकता दी गई है जो लिक्विडेशन या रेज्योल्यूशन की लागत को पूरा करने के लिए अंतरिम फाइनेंस का इंतजाम करते हैं।  
इसके बाद वर्कर्स और सिक्योर्ड क्रेडिटर्स को पैसा दिया जाएगा। इन दोनों की वैल्यू एक समान है। वर्कमैन के अलावा दूसरे कर्मचारियों और अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स का नंबर सबसे अंत में आता है।


इस संशोधन की एक अहम बात यह है कि बैंकरप्सी रेज्योल्यूशन या लिक्विडेशन केंद्र, राज्य या स्थानीय सरकार के तहत आएगी। यानी इनमें से जिसका भी दिवालिया कंपनी पर बकाया हो।