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25,000 करोड़ रुपए के स्पेशल विंडो का फायदा क्या आपको मिलेगा, जानिए हर सवाल का जवाब

स्पेशल विंडो के तहत सिर्फ उन्हीं परियोजनाओं को मदद दी जाएगी जो पूंजी की कमी के कारण अटके हैं
अपडेटेड Nov 08, 2019 पर 15:03  |  स्रोत : Moneycontrol.com

फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण रियल एस्टेट सेक्टर को खुश करते हुए 25,000 करोड़ रुपए का स्पेशल फंड अलॉट किया है। कैबिनेट ने 25,000 करोड़ रुपए के स्पेशल विंडो की मंजूरी दी है। इस फंड का इस्तेमाल अटकी हुई परियोजनाओं को पूरा करने में किया जाएगा। सरकार के इस कदम से होमबायर्स को बड़ी राहत मिल सकती है।


हालांकि ऐेसे में सवाल यह है कि इस फंड से होमबायर्स की मदद कैसे होगी। ऐसे ही सवालों का जवाब देते हुए फाइनेंस मिनिस्ट्री ने कुछ सवालों के जवाब दिए हैं। इनके जरिए आप यह जान सकते हैं कि 25,000 करोड़ रुपए का फंड कैसे होमबायर्स और रियल्टी सेक्टर की मुश्किलें दूर कर सकता है।


स्पेशल विंडो में सरकार और इनवेस्टमेंट मैनेजर्स की क्या भूमिका है?


सरकार प्रस्तावित फंड के प्रायोजक के तौर पर रहेगी? मार्केट रेगुलेटर SEBI के (AIF) रेगुलेशंस एक्ट, 2012 के तहत इस फंड की अथॉरिटी सरकार के पास रहेगी। इनवेस्टमेंट मैनेजर की जिम्मेदारी फंड जुटाने, इनवेस्टमेंट और उन्हें मैनेज करने की होगी।


फंड मैनेज कौन करेगा?


25,000 करोड़ रुपए के इस फंड का मैनेजमेंट SBICAP वेंचर्स लिमिटेड करेगी। SBICAP इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के जरिए यह काम करेगी।  


NPA और NCLT में जा चुकी परियोजनाओं को मिलेगी मदद?


स्टेकहोल्डर्स और सरकार से मिली जानकारियों के आधार पर NPA और NCLT में जा चुकी परियोजनाओं को भी फंड दिया जा सकता है। इस फंड के लिए कंपनियों के आवेदन की जांच इनवेस्टमेंट कमिटी करेगी। कंपनियों की बैलेंस शीट की जांच के बाद यह कमिटी ही तय करेगी कि फंड देना है या नहीं। NPA और NCLT में पहुंचीं जिन कंपनियों के रेज्योलूशन प्लान को रद्द कर दिया गया है या मंजूर नहीं किया गया है, उन्हें इस फंड का फायदा नहीं मिलेगा।


सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में अटके मामलों में इस फंड का लाभ मिलेगा?


स्पेशल विंडो के तहत सिर्फ उन्हीं परियोजनाओं को मदद दी जाएगी जो पूंजी की कमी के कारण अटके हैं। लेकिन अगर कोई प्रोजेक्ट कानूनी पचड़े में फंसा है तो उसकी कोई मदद नहीं की जाएगी। 


किस आधार पर की जाएगी कंपनियों की फंडिंग?


जो प्रोजेक्ट फंड की कमी से अटके हैं, उन्हें स्पेशल विंडो का फायदा मिलेगा।
अफोर्डेबल और मिडिल इनकम कैटेगरी वाली परियोजनाओं को फंड दिया जाएगा।
जिन कंपनियों का नेटवर्थ पॉजिटिव होगा, उन्हें इस फंड का फायदा मिलेगा। पॉजिटिव नेटवर्थ वाली कोई कंपनी अगर NPA और NCLT में है तो भी उसे इसका फायदा मिलेगा।
प्रोजेक्ट का RERA में रजिस्टर होना जरूरी है।
जो परियोजनाएं पूरी होने के कगार पर हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। 


मिड-इनकम और अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट कौन से कहलाएंगे?


स्पेशल विंडो के तहत पहला फंड अफोर्डेबल और मिड-इनकम हाउसिंग को दिया जाएगा। यानी जिन परियोजनाओं में फ्लैट 200 स्क्वायर मीटर से कम होंगे, उन्हें फंड दिया जाएगा।


मुंबई में 2 करोड़ रुपए या इससे सस्ते फ्लैट।
दिल्ली-NCR, चेन्नई, कोलकाता, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु और अहमदाबाद में 1.5 करोड़ रुपए या इससे सस्ते फ्लैट।
देश के बाकी हिस्सों में 1 करोड़ रुपए या इससे सस्ते फ्लैट।


फ्लैट के इस प्राइस कैप में क्या-क्या शामिल है?


इस कीमत में सोशल एमेनिटीज, पार्किंग, हाउसिंग सोसायटी चार्ज, ब्रोकरेज, डिपॉजिट्स, रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी चार्ज शामिल नहीं है।


अटकी हुई परियोजनाओं की इनवेंटरी बेचने का हक किसके पास होगा?


इनवेंटरी बेचने का पहला हक डेवलपर्स के पास होगा लेकिन इनवेस्टमेंट मैनेजर भी इसके लिए जरूरी कदम उठा सकता है।


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