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आवाज़ अड्डाः नए साल में कैसी रहेगी अर्थव्यवस्था की तस्वीर!

प्रकाशित Sat, 29, 2018 पर 14:06  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

2018 जाने वाला है। नए साल के आगाज के साथ सरकार के सामने मौके कम और चुनौतियां ज्यादा होंगी। लोकसभा के चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में लोगों की सरकार से उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में हार के बाद मोदी सरकार पर जनता को खुश करने का दबाव और बढ़ गया है। ऐसे में गांव, किसान और गरीब के लिए कोई सौगात का इंतजार हो रहा है। चुनावी रेवड़ियां सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ाती हैं। ऐसे में क्या सरकार इस स्थिति में है कि वो अर्थव्यवस्था को विकास को अर्थव्यवस्था की चिंता किए बिना लोक लुभावने फैसले कर सके। सवाल ये है कि क्या 2019 में राजनीति अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगी?


नए साल में नई सरकार बनाने की कवायद भी तेज होने वाली है। जनता से नए वादे होंगे और नई उम्मीदें जगाई जाएंगी। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी सतर्क हो गई है। इन चुनावों में किसानों की बदहाली का मुद्दा उठाकर और किसानों का कर्ज माफ करने का वादा करके कांग्रेस सत्ता में आ गई। अब 2019 में मोदी सरकार का ध्यान भी गांव, गरीब और किसान पर रहने वाला है।


चुनाव से पहले सरकार मिडिल क्लास को लुभाने के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम का एलान कर सकती है। इसमें सभी परिवारों को हर महीने तय भत्ता देने का इंतजाम हो सकता है। इसके अलावा किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार उन्हें सीधी आर्थिक मदद पहुंचा सकती है।


लोक लुभावने फैसले होंगे तो सरकारी खजाने पर बोझ पड़ना तय है। लेकिन क्या सरकार खजाना लुटाने की स्थिति में है। इस साल अप्रैल से नवंबर के बीच वित्तीय घाटा 7.16 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है, जो कि साल भर के बजट अनुमान से ज्यादा है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8 फीसदी के पार चली गई थी जो दूसरी तिमाही में घटकर 7.1 फीसदी पर आ गई है। बैंक भी एनपीए के बोझ से जूझ रहे हैं।


सितंबर के अंत तक बैंकों के ग्रॉस एनपीए करीब 10 लाख करोड़ रुपए थे। हालांकि सरकार के लिए राहत की बात ये है कि क्रूड के दाम फिर से गिर रहे हैं और रुपया भी कुछ हद तक संभल गया है। जीएसटी के मोर्चे पर भी सरकार छोटे कारोबारियों और आम आदमी को राहत देने की कोशिश कर रही है। जितनी ज्यादा लोगों की उम्मीदें हैं उतनी ही ज्यादा सरकार के लिए मुश्किल भी। सवाल ये है कि क्या सरकार अर्थव्यवस्था की चिंता किए बिना आम आदमी के लिए अपनी झोली खोल देगी? प्रजातंत्र में जनता की दिक्कतें ज्यादा मायने रखती हैं या अर्थव्यवस्था की रफ्तार? और क्या 2019 में हम अर्थनीति पर राजनीति को हावी होता देखेंगे?