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आवाज़ अड्डा: फैसले के बाद भी कंफ्यूजन; दिल्ली में काम कम, ड्रामा ज्यादा!

प्रकाशित Fri, 06, 2018 पर 07:57  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

दिल्ली का बॉस कौन है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी इस बात का जवाब नहीं मिल पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था को छोड़ बाकी फैसले दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में दे दिए हैं। इसके बावजूद अधिकारी पुराने नोटिफिकेशन का हवाला देकर तबादले पर केजरीवाल सरकार के आदेश को मानने से इनकार कर रहे हैं। तो क्या केजरीवाल और उप-राज्यपाल अनिल बैजल के बीच टकराव अभी खत्म नहीं हुआ है। और अगर ट्रांसफर फाइलें अभी भी एलजी के पास जाएंगी तो क्या ये कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं होगी?


सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-राज्यपाल अनिल बैजल के बीच विवाद जारी है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले के मुताबिक दिल्ली में जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था केंद्र के अधीन रहेंगे जबकि बाकी फैसले दिल्ली सरकार करेगी। इसके बाद दिल्ली सरकार ने अधिकारियों के तबादले और पोस्टिंग के लिए फैसले लेने का अधिकार मंत्रियों को दे दिया और सर्विसेज विभाग से इसे लागू करने के लिए कहा। लेकिन विभाग ने दिल्ली सरकार का आदेश मानने से इनकार कर दिया। दिल्ली सरकार इसे कोर्ट के फैसले की अवमानना बता रही है।


मुख्यमंत्री केजरीवाल ने भी एलजी को चिट्ठी लिखकर बता दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अब किसी फैसले पर उनकी मंजूरी की जरूरत नहीं है और सर्विसेज से संबंधित अधिकार मंत्रियों के पास हैं। दरअसल दो साल पहले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद एलजी ने सरकार से ट्रांसफर और पोस्टिंग के अधिकार अपने पास रख लिए थे या डिपार्टमेंट हेड को दे दिए थे। कुछ अधिकार मुख्य सचिव को दिए गए थे। दिल्ली के सर्विसेज विभाग की दलील है कि 29 अगस्त, 2016 को जो नोटिफिकेशन जारी हुआ था उसके मुताबिक ट्रांसफर और पोस्टिंग के अधिकार उप-राज्यपाल, मुख्य सचिव, सेक्रेटरी सर्विसेज और संबंधित विभाग के सचिव के पास ही रहेंगे। विभाग के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अगस्त 2016 के नोटिफिकेशन को रद्द करने की जानकारी नहीं है।


तबादले के मुद्दे पर केजरीवाल और उप-राज्यपाल जिस तरह फिर से आमने सामने आ गए हैं उससे यही लगता है कि झगड़ा अभी सुलझा नहीं है। वैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखें तो उसका भाव ये है कि दिल्ली में भी राजकाज का हक जनता की चुनी हुई सरकार के पास है लेकिन राज्यपालों से अलग दिल्ली के उप-राज्यपाल को भी अख्तियार हासिल हैं। दोनों एक दूसरे की सीमाओं का सम्मान करें और मिलजुल कर विवादों को सुलझा लें। लेकिन लगता है कि दिल्ली में दोनों ही अपनी बात ऊपर रखने की जिद पर अड़े हैं। नहीं तो आदेश आते ही आनन-फानन में अधिकारियों के तबादले की केजरीवाल को जल्दी क्या थी। और एलजी के मातहत अभी काम कर रहे अफसर भी जैसे इसी ताक में बैठे थे और एक्शन होते ही उन्होंने जवाब का गोला दाग दिया।


अगर आम आदमी पार्टी सुप्रीम कोर्ट गई थी तो फिर उसने पुराने नोटिफिकेशन पर अदालत से स्थिति साफ क्यों नहीं कराई। क्या अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे पहलुओं को छोड़ दिया जिससे कंफ्यूजन बना हुआ है। या केजरीवाल और एलजी दोनों की झगड़ा खत्म करने में दिलचस्पी नहीं है।