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आवाज़ अड्डाः तीन तलाक बिल पर बढ़ी तकरार

प्रकाशित Tue, 01, 2019 पर 07:58  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

संसद में तीन तलाक बिल पर घमासान मचा हुआ है। राजनीतिक पार्टियां अपने अपने हिसाब से इसकी व्याख्या कर रही हैं। सरकार इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से जोड़ रही है। तो विपक्ष बिल में से तीन साल की सजा का प्रावधान हटाने की मांग पर अड़ा हुआ है। लेकिन जिस तरह इस पूरे मामले पर हंगामा हो रहा है उसे देखकर लगता है कि इस पर काम कम और राजनीति ज्यादा हो रही है। क्या विपक्षी पार्टियों की कोई राजनीतिक मजबूरी है जिसकी वजह से वो इस बिल का विरोध कर रही हैं। राज्यसभा में सरकार के पास संख्या बल कम है। ऐसे में सरकार को इस बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजकर विपक्षी की मांग मानने में क्या हर्ज है। सवाल ये है कि क्या तीन तलाक पर 3 साल की सजा का विरोध सही है?


राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखकर साफ लग रहा है कि यहां तीन तलाक बिल की राह आसान नहीं होने वाली। विपक्ष के हंगामे के बीच तीन तलाक बिल पिछले हफ्ते लोकसभा से पास हो चुका है। लेकिन राज्यसभा में हालात एकदम उलट हैं। विपक्षी पार्टियां एकजुट हैं और वो बिल को ज्वाइंट सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग पर अड़ी हुई हैं।


दरअसल बिल में एक साथ तीन तलाक देने पर मुस्लिम महिला के पति को तीन साल जेल की सजा का प्रावधान है। पूरा घमासान इसी को लेकर मचा हुआ है। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि तलाक एक सिविल मसला है और इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वो इस प्रावधान को हटाने की मांग कर रही हैं। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना है कि सरकार इस बिल के जरिए मुस्लिम घरों में दखल दे रही है।


राज्य सभा में तीन तलाक बिल को पास कराने के लिए सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। लोकसभा के मुकाबले राज्य सभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। लेकिन बीजेपी को भरोसा है कि वो यहां भी तीन तलाक बिल पास कराने में सफल हो जाएगी।


सरकार एक साथ तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए सितंबर में अध्यादेश लेकर आई थी। अध्यादेश की मियाद खत्म होने से पहले सरकार इसके लिए कानून लाना चाहती है। पिछले साल अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को गैरकानूनी करार दे चुका है। कोर्ट के आदेश के बाद भी देशभर में तीन तलाक के करीब 250 मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में इसकी रोकथाम के लिए कानून में सजा का प्रावधान होना जरूरी लगता है।


सवाल यहां ये है कि क्या विपक्ष का तीन साल की सजा का विरोध करना सही है? या मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने के जोश में सरकार ने कुछ ज्यादा सजा का प्रावधान कर दिया है? अब जो बहस हो रही है उससे लगता है कि हर पार्टी अपनी सहूलियत के हिसाब से इस मुद्दे पर पॉलिटिक्स कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये बिल मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी को बेहतर बनाएगा या उसे और बदतर कर देगा?