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अयोध्या मामले में 18 अक्टूबर तक पूरी होगी सुनवाई, क्या सभी पक्ष मानेंगे SC का फैसला!

सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को 18 अक्टूबर तक दलीलें खत्म करने के निर्देश दिए हैं।
अपडेटेड Oct 01, 2019 पर 13:42  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

राम मंदिर मामले पर फैसले की घड़ी करीब आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को 18 अक्टूबर तक दलीलें खत्म करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पास फैसला सुनाने के लिए एक महीने का वक्त बचेगा। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए रास्ता खुला रखा है। अब देखना ये है कि सालों से लटके इस मामले में क्या अब सुप्रीम कोर्ट समय पर सुनवाई खत्म करके फैसला सुना देगा।


अक्टूबर शुरू होने वाला है और राम मंदिर मामले में तीनों पक्षों की दलीलें खत्म होने का समय भी करीब आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को 18 अक्टूबर तक दलीलें खत्म करने की डेडलाइन दी है। 6 अगस्त से लगातार शुरू हुई सुनवाई में सबसे पहले निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान ने अपनी दलीलें रखीं।


निर्मोही अखाड़ा ने कोर्ट में कहा कि उनका दावा 2.77 एकड़ जमीन पर है जिस पर उनका अधिकार है। ढांचे के अंदर का बरामदा और राम जन्मस्थान निर्मोही अखाड़े के पास रहा है, सीता रसोई, चबूतरा और भंडार गृह का अधिकार भी उनके पास है। निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि 1934 से मुस्लिमों को विवादित ढांचे में एंट्री नहीं मिली है। वो देवस्थान की देखरेख करने वाले दावेदार हैं और पूजा का अधिकार चाहते हैं। निर्मोही अखाड़ा के साथ-साथ रामलला विराजमान ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें रखीं।


रामलला विराजमान ने कहा कि लोगों की आस्था इस बात का प्रमाण है कि विवादित स्थल ही राम का जन्मस्थान है। राम की जन्मस्थली कानूनी व्यक्ति की तरह है इसलिए वो वादी हो सकती है। रामलला विराजमान ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक विवादित जमीन पर मंदिर था। उन्होंने कहा कि जहां मस्जिद बनाई गई उसके नीचे मंदिर का ढांचा था और इसमें कई स्तंभ ईसा पूर्व 200 साल पहले के हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें शुरू हुईं।


सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में कहा कि 1934 में बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचाया गया। 1949 में ढांचे में जबरन घुसपैठ करके मस्जिद के अंदर चुपके से मूर्तियां रखी गईं। 1992 में मस्जिद को तोड़ा गया। मुस्लिम पक्ष ने माना कि पहले राम चबूतरे पर पूजा होती थी। लेकिन राम चबूतरे का मालिकाना हक निर्मोही अखाड़ा के पास नहीं है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा कि 1934 के बाद भी मस्जिद में नमाज पढ़ी गई।


मस्जिद के अंदर अल्लाह लिखे होने के सबूत भी हैं। गर्भगृह में कभी पूजा नहीं हुई। मुस्लिम पक्ष ने कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनवाई गई। उसने ASI की रिपोर्ट को अनुमान पर आधारित बताया। मुस्लिम पक्ष ने कहा कि अभी का और 1885 का मुकदमा, दोनों ही एक जैसे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि 1885 में हिंदू पक्ष ने एक हिस्से पर अपना दावा ठोका था और अब पूरे विवादित क्षेत्र पर अपना मालिकाना हक बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में दलीलों का सिलसिला जारी है। अब क्या ये उम्मीद की जाए कि 18 अक्टूबर तक राम मंदिर मामले की सुनवाई पूरी हो जाएगी। और क्या 17 नवंबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के रिटायरमेंट से पहले राम मंदिर पर फैसला आ जाएगा?


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