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आवाज अड्डा: कांग्रेस में भारी कन्फ्यूजन, हावी हो रही है नेताओं की गुटबाजी!

लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से कांग्रेस की तरफ से कोई भरोसा पैदा करने वाला एक्शन नहीं दिखा है।
अपडेटेड Sep 13, 2019 पर 15:19  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

कांग्रेस में आखिर चल क्या रहा है- ये कांग्रेस वालों के लिए लाख टके का सवाल है और राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के लिए कौतूहल का विषय। क्योंकि लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से कांग्रेस की तरफ से कोई भरोसा पैदा करने वाला एक्शन नहीं दिखा है। हां कई ऐसे सिग्नल मिल रहे हैं जिनसे लगता है कि पार्टी में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस की मायूसी हैरान करने वाली नहीं थी। लेकिन अब लगता है कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में हताशा है। इसकी झलक देखनी हो तो पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लंबी लिस्ट देख लीजिए। इस भागमभाग के बीच जो पार्टी के अंदर रह भी गए हैं वो विरोधियों का मुकाबला करने के बजाय अपनों से ही लड़ रहे हैं। कई मुद्दों पर अब पार्टी के अंदर ही अलग अलग स्वर उठ रहे हैं। अंतरिम तौर पर ही पार्टी का नेतृत्व कर रही सोनिया की भी पार्टी पर पहले जैसी मजबूत पकड़ रह गई है क्या? इस पारी में वो क्या कांग्रेस का कुछ भला कर पाएंगी?


संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस को उबारने के लिए सोनिया गांधी समेत तमाम बड़े पार्टी नेता मंथन कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से कांग्रेस में नेतृत्व का संकट गहरा गया था। सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद अब पार्टी को फिर से खड़ा करने की रणनीति बनी है। राज्य स्तर पर प्रेरक नियुक्त किए जाएंगे जो पार्टी के एजेंडे पर काम करेंगे। इसके लिए राज्य इकाइयों को पार्टी के नेताओं की पहचान करने के लिए कहा गया है। इसके अलावा जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने के लिए कांग्रेस सदस्यता अभियान भी चलाएगी।


कांग्रेस की परेशानी जितनी दिख रही है उससे कहीं ज्यादा है। महाराष्ट्र में चुनाव सिर पर हैं लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी छोड़कर भाग रहे हैं। महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री कृपाशंकर सिंह, हर्षवर्धन पाटिल और एक्ट्रेस उर्मिला मातोंडकर ने कांग्रेस छोड़ दी है। हर्षवर्धन पाटिल ने तो बीजेपी का दामन भी थाम लिया है। इससे पहले राधाकृष्ण विखे पाटिल और सुजय पाटिल भी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। कृपाशंकर सिंह कांग्रेस छोड़ने की वजह भी बता रहे हैं।


उर्मिला मातोंडकर के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के नेता संजय निरुपम पार्टी में कलह की तरफ इशारा कर रहे हैं। कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार बची है। यहां भी कांग्रेस लीडरशिप ने सरकार को राम भरोसे छोड़ रखा है। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान चल रही है। सिंधिया के समर्थक कमलनाथ सरकार की आलोचना करते हैं। यही हाल राजस्थान का है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच कई मुद्दों पर मतभेद है। सचिन पायलट उप-मुख्यमंत्री होकर कानून व्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं।


जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कांग्रेस और पार्टी नेताओं की लाइन अलग-अलग हो गई है। जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर काम की आलोचना से बात नहीं बनेगी। शशि थरूर संगठन में जल्द चुनाव की सलाह दे चुके हैं। सॉफ्ट हिंदुत्व की कांग्रेस की नई परिपाटी पर भी वो सवाल उठा रहे हैं।


कांग्रेस में कोई करिश्मा हो जाएगा  इसकी उम्मीद कोई नहीं कर रहा है। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उसकी प्रासंगिकता बनी रहे क्या इसका कोई प्लान है? और ये कोशिश कितनी गंभीर है? सोनिया गांधी पर तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की नैया पार कराने की जिम्मेदारी है। लेकिन पार्टी के नेताओं के बीच जिस तरह की कलह है उन सब के बीच ये टारगेट कितना आसान होगा?


सोनिया गांधी का फुल टाइम अध्यक्ष बनने का इरादा नहीं है तो क्या विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए खुला चुनाव होगा या गांधी परिवार का ही कोई विश्वस्त इस पद पर बिठा दिया जाएगा? दिल्ली दरबार की इस बड़ी दुविधा के बीच सवाल यही रहेगा कि गांव कस्बों में पार्टी के कार्यकर्ताओं का हौसला कौन बढ़ाएगा? महत्वाकांक्षी नेता अपना अलग रास्ता पकड़ रहे हैं तो कार्यकर्ता कब तक अपनी वफादारी दिखाते रहेंगे।


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