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आवाज़ अड्डाः संसद में धार्मिक नारेबाजी लगाना कितना सही!

लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर के कपाट खुलते ही कुछ ऐसा हुआ जिसकी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है।
अपडेटेड Jun 20, 2019 पर 10:09  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर के कपाट खुलते ही कुछ ऐसा हुआ जिसकी चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सांसदों के शपथ ग्रहण के दौरान लोकसभा धर्म की पहचान बताने का अखाड़ा बन गया। भारतीय जनता पार्टी के उत्साही सांसदों ने जय श्रीराम से लेकर हर-हर महादेव, राधे-राधे, जय मां काली के नारे लगा दिए। ऐसा लगा मानो संसद में शपथ ग्रहण नहीं, बल्कि पूजा पाठ चल रहा हो।


हर कोई अपनी आस्था और देशभक्ति का प्रदर्शन करने लगा। इसके जवाब में अल्लाह-हू-अकबर के नारे भी लगे और वंदे मातरम कहने पर एतराज भी जताया गया। संसद के अंदर सब कुछ हल्के फुल्के अंदाज में निपट गया। लेकिन ये आने वाले दिनों के लिए संकेत भी दे रहा है और सवाल भी खड़े कर रहा है। जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को संसद में उनकी परेशानियों को लेकर बहस करनी चाहिए या संसद में धार्मिक नारेबाजी?


ये है 17वीं लोकसभा की एकदम अलग तस्वीर। आज तक ना सुनी और ना देखी। अगले पांच सालों में संसद कैसे चलेगी, ये तस्वीरें इसके संकेत भी दे रही हैं। भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आई है। चुनाव के दौरान चली राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की बयार अब संसद के अंदर भी चलने लगी है। सांसदों में शपथ युद्ध छिड़ गया और लोकसभा जय श्रीराम, वंदे मातरम, जय मां काली, हर हर महादेव के नारों से गूंज उठी। जवाब में अल्लाह-हू-अकबर के नारे भी लगे। समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने तो वंदे मातरम पर ही एजराज जता दिया।


संसद के अंदर वंदे मातरम से परहेज बाहर भी दिखाई दिया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने सांसद का बचाव करते दिखे। संसद के अंदर धार्मिक नारेबाजी पर विपक्षी पार्टियां एतराज जता रही हैं। कांग्रेस इस नई प्रथा को ठीक नहीं मान रही।


लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में धार्मिक नारेबाजी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या संसद अपने धर्म की पहचान बताने का अखाड़ा बन रही है या फिर ये विरोधियों को चिढ़ाने या नीचा दिखाने का नया तरीका है? बहुमत वाली पार्टी जब धार्मिक नारे लगाकर विरोधियों को उकसाती है तो वो इसके जरिए क्या हासिल करना चाहती है? और क्या वो प्रधानमंत्री की उस भवाना का अनादर नहीं कर रहे हैं जो सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास की बात करते हैं? या ये हावी होते बहुसंख्यकवाद का एक परिचायक है?