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आवाज़ अड्डा: जनसंख्या नियंत्रण में धार्मिक रंग देखना कितनी सही है!

स्वाधीनता दिवस के भाषण में नरेंद्र मोदी ने कहा है कि छोटा परिवार भी देशभक्ति की निशानी है।
अपडेटेड Aug 19, 2019 पर 10:17  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

हम दो हमारे दो। छोटा परिवार सुखी परिवार। करीब-करीब 40 साल से ये नारे लगता है कहीं खो से गए थे। मगर अब फिर एक बार छोटा परिवार सुखी परिवार ही नहीं देशभक्त परिवार भी होनेवाला है। स्वाधीनता दिवस के भाषण में नरेंद्र मोदी ने कहा है कि छोटा परिवार भी देशभक्ति की निशानी है। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने देश के सभी नागरिकों से अपील की कि वो इस आदर्श को अपनाएं। हल्का सा इशारा भी दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों को भी इसके लिए योजनाएं लानी चाहिए। मगर देखने वाली बात ये है कि पिछले पच्चीस से तीस सालों में जो देश जनसंख्या विस्फोट को डेमोग्राफिक डिविडेंड बताता रहा, अब वो फिर एक यू टर्न कैसे लेगा। कितना आसान होगा इस विचार को दोबारा अंजाम तक पहुंचाना। दूसरी चिंता ये है कि इमरजेंसी के बाद के दौर में जब भी जनसंख्या नियंत्रण की बात उठी, उसमें एक राजनीतिक और धार्मिक एंगल भी जुड़ता रहा। ऐसे में आजादी की वर्षगांठ पर खुद प्रधानमंत्री की अपील आखिर क्या कहना चाहती है।


लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बच्चे वालों को सम्मान देने की बात कही है। उन्होंने सभी समाज के लोगों से इस आदर्श को अपनाने की अपील की है। उन्होंने ये भी कहा है कि समाज के साथ-साथ केंद्र और राज्य की सरकारों को भी चाहिए कि वो इस दिशा में योजनाओं के साथ पहल करें। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर अब तक दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों से सुविधाएं छीन लेने की बात होती रही है। शायद ये पहली बार है जब प्रधानमंत्री के स्तर से छोटे परिवार को आदर्श बनाकर उन्हें सम्मानित करने की बात कर रहे हैं। राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश इसे आगे बढ़ाते हुए सरकारों से इसपर ठोस कार्यक्रम बनाने की बात कहते हैं।


लेकिन भारत में आबादी नियंत्रण की बात कभी राजनीति से खाली नहीं रही। हाल ही में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा था कि दो से ज्यादा बच्चे वालों से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिए। तब इस बयान को मुसलमानों के खिलाफ बताकर काफी विवाद हुआ था। अब प्रधानमंत्री की अपील को AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी नाकामी छिपाने का प्रयास बताया है। ओवैसी ने ट्वीट किया है कि भारत की अधिकांश आबादी युवा और प्रोडक्टिव है लेकिन इसका फायदा हमें 2040 तक ही मिलेगा। प्रधानमंत्री को पता नहीं है कि इस फायदे का क्या इस्तेमाल करना है। इसलिए वो ऐसा विचार थोपने की कोशिश कर रहे हैं जो पहले खारिज किया जा चुका है। ताकि अपनी जिम्मेदारी से बच सकें। वहीं दलित नेता प्रकाश अंबेडकर कहते हैं कि 2035 के बाद आबादी स्थिर हो जाएगी, यहां तक कि घटने लगेगी। ऐसे में प्रधानमंत्री की बात महज एक प्रोपेगैंडा है।


सवाल उठता है कि क्या जनसंख्या विस्फोट वाकई देश के सामने एक बड़ा संकट है? सवाल ये भी है कि सबसे ज्यादा युवाओं वाले देश के तौर पर जो डेमोग्राफिक डिविडेंड हमारे पास है, क्या हमने उसका सही इस्तेमाल किया? लोकतंत्र में संख्याबल सबसे अहम है। ऐसे में क्या जनसंख्या नियंत्रण का इस्तेमाल सिर्फ एक राजनीतिक हथियार के तौर पर हो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या बिना कानून बनाए हमें आबादी को कंट्रोल करने में कामयाबी मिलेगी? इन्हीं सवालों के जबाव खोजने की कोशिश है आवाज़ अड्डा।