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कांग्रेस में नेताओं की खुली बगावत, पार्टी को क्या होगा इससे नुकसान

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस कोई सबक नहीं ले पाई है।
अपडेटेड Oct 06, 2019 पर 13:23  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस कोई सबक नहीं ले पाई है। कांग्रेस में अंदरुनी कलह बढ़ती जा रही है। कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। तो कुछ नेताओं ने पार्टी में रहकर बगावती तेवर अपना लिए हैं। महाराष्ट्र में संजय निरुपम और हरियाणा में अशोक तंवर ने कांग्रेस आलाकमान पर ही निशाना साध दिया है। पार्टी में चापलूसी और गुटबाजी के आरोप लगाए जा रहे हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस नेताओं की बगावत पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है।


महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनावी महासंग्राम के बीच कांग्रेस के अंदर अलग ही महाभारत छिड़ गई है। दोनों राज्यों में कांग्रेस के बड़े नेताओं ने बगावत कर दी है। महाराष्ट्र में टिकट बंटवारे से नाराज चल रहे कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर बड़े आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि दिल्ली में बैठे लोगों में समझ की कमी है। जो लोग सोनिया गांधी के साथ जुड़े हैं वो साजिश रच रहे हैं। राहुल गांधी के साथ जुड़े लोगों को पार्टी में अलग-थलग किया जा रहा है। पार्टी में फीडबैक सिस्टम खत्म हो गया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो लंबे समय तक कांग्रेस में नहीं रह पाएंगे।


हरियाणा में भी कांग्रेस के अंदर गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए अपने समर्थकों की लिस्ट सौंपी थी जिसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। इससे नाराज होकर तंवर ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। तंवर का आरोप है कि हरियाणा कांग्रेस अब हुड्डा कांग्रेस बनती जा रही है। पार्टी में जमीन से जुड़े नेताओं की अनदेखी हो रही है। और उनके खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया जा रहा है। उन्होंने कांग्रेस में टिकट बंटवारे पर सवाल उठाए हैं।


यूपी के रायबरेली से विधायक और सोनिया गांधी की करीबी मानी जाने वाली अदिति सिंह भी कांग्रेस के फैसलों के खिलाफ जा रही हैं। दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर विधानसभा के विशेष सत्र में पहुंच कर अदिति ने अपने बगावती तेवर दिखा दिए। कांग्रेस ने इस सत्र का बहिष्कार किया था। लेकिन कांग्रेस अब भी बेफिक्र दिख रही है।


विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। कांग्रेस विरोधियों से लड़ने के बजाए अपने ही लोगों से निपट रही है। सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने का एक मकसद ही यही था कि वो तीन-चार राज्यों के अहम चुनावों तक पार्टी को एकजुट रखेंगी। लेकिन यहां तो बात और बिगड़ती जा रही है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां भी नेताओं में सिर फटौव्वल हो रही है।


सवाल ये है कि कांग्रेस में आखिर किसकी चल रही है? क्या कांग्रेस में गुटबाजी इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि पार्टी के नेता सोनिया गांधी की बात भी नहीं मान रहे हैं? क्या पार्टी में सोनिया और राहुल के गुट हैं जो एक दूसरे के खिलाफ चाल चल रहे हैं? और जिस हालत में कांग्रेस आज है क्या वो किसी भी राज्य में बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में है?


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