आवाज़ अड्डाः दलित वोट बैंक पर सियासत! -
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आवाज़ अड्डाः दलित वोट बैंक पर सियासत!

प्रकाशित Fri, 03, 2018 पर 07:39  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

एससी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर राजनीति तेज हो गई है। कांग्रेस सरकार से पूछ रही है कि अगर वो इस मुद्दे पर अध्यादेश लाना चाहती थी तो पहले क्यों नहीं लाई। सरकार ने भी साफ कर दिया है कि वो बदलावों के साथ एससी-एसटी बिल को संसद के इसी सत्र में पास कराना चाहती है । सवाल बदलाव की टाइमिंग को लेकर उठ रहे हैं । दरअसल बीएसपी अध्यक्ष मायावती धीरे-धीरे गैर एनडीए दलों के बीच मुख्य किरदार में आ रही हैं। ऐसे में बीजेपी उनकी मजबूत घेराबंदी करने की कोशिश कर रही है। साथ ही चुनाव से पहले सरकार ने दलित संगठनों के गुस्से को भी शांत करने की कोशिश की है । लेकिन सवाल ये है कि क्या एससी-एसटी को कड़ा करके सरकार दलितों का दिल जीत पाएगी?


संसद में एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर तीखी बहस हुई। एससी-एसटी एक्ट के बहाने कांग्रेस ने दलितों और आदिवासियों के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की। कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया कि इस दौरान सरकार ने कई अध्यादेश पास कराए लेकिन दलितों और आदिवासियों के हितों की रक्षा करने वाले एक्ट की मजबूती पर अध्यादेश नहीं ला पाई।


कांग्रेस को जवाब देने के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जरूरत पड़ी तो इससे भी कड़ा बिल लाएंगे। सरकार इसी सत्र में बिल को पारित कराना चाहती है।


एनडीए के सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर काफी आक्रामक हैं। रामविलास पासवान ने तो आंदोलन की धमकी तक दे डाली थी। दलित संगठनों ने केंद्र सरकार के खिलाफ भारत बंद का एलान भी कर दिया था । पासवान तो इस मुद्दे पर फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज को रिटायरमेंट के बाद एनजीटी में तैनाती मिलने का भी विरोध कर रहे हैं। जेडीयू भी एससी-एसटी एक्ट को नरम करने के विरोध में आ गई थी। लेकिन सरकार ने एससी-एसटी एक्ट के मूल प्रावधानों को बहाल करने के लिए बिल के प्रस्ताव को मंजूरी देकर फिलहाल इन सबको शांत कर दिया है।


लेकिन जानकार एससी-एसटी एक्ट में बदलाव की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि विपक्षी पार्टियों के बीच बीएसपी अध्यक्ष मायावती के बढ़ते प्रभाव को काउंटर करने के लिए सरकार ने ये कदम उठाया है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छ्त्तीसगढ़ में चुनाव नजदीक हैं। बीजेपी को पता है कि एससी-एसटी एक्ट को मायावती दलितों के बीच मुद्दा बना सकती हैं। ऐसे में बीजेपी उनकी मजबूत घेराबंदी करना चाहती है।


बीजेपी इस मुद्दे पर आक्रामक तेवर दिखाने से इसलिए भी बच रही थी क्योंकि सवर्ण वोट बैंक उससे नाराज हो सकता है, क्योंकि इस कानून का इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ होता है। लेकिन इस मुद्दे पर खामोशी से मायावती के लिए खुला मैदान छोड़ने जैसी स्थिति हो रही थी। ऐसे में मोदी सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। लेकिन यहां सवाल ये है कि क्या दलितों को साधने के चक्कर में सवर्ण वोट बैंक नाराज नहीं होगा? और क्या क्या एससी-एसटी एक्ट को कड़ा करके सरकार दलितों का दिल जीत पाएगी?