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आवाज़ अड्डा: आस्था की आड़ में राजनीति, मंदिर में भेदभाव क्यों!

प्रकाशित Thu, 11, 2018 पर 08:04  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की इजाजत देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केरल में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। एक तबका इस फैसले से खुश नहीं है। वो सवाल उठा रहा है कि अदालतें आखिर धार्मिक आस्था के मामलों में क्यों दखल दे रही हैं। बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी फैसले का विरोध करनेवालों के साथ हैं। जो बात हमारी समझ में नहीं आ रही है कि वो ये है कि लंबे समय तक ये मामला कोर्ट में चला तो क्या वो एक प्रपंच था। क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपके हक में आएगा तभी आप उसे मानेंगे। हमारा देश संविधान की भावना से चलेगा या जनभावना से। अगर सबरीमाला में खास उम्र की महिलाओं पर पाबंदी लगा रहना सही है तो एक बार में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही क्यों है। क्या हम सहूलियत के हिसाब से अदालत के फैसलों को मानेंगे और आस्था के नाम पर अदालतों पर दबाव बनाते रहेंगे।


16 अक्टूबर से सबरीमाला में भगवान अयप्पा मंदिर के दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए खुल जाएंगे। लेकिन इससे पहले मंदिर में हर उम्र की महिलाओं की एंट्री के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर के दरवाजे सभी महिलाओं के लिए खोल दिए हैं। अब तक मंदिर में 10 से 50 साल तक उम्र की महिलाओं की एंट्री पर पाबंदी थी। केरल में इस मामले पर राजनीति भी गरमा रही है। राज्य सरकार ने इस मामले पर पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करने का फैसला किया है तो बीजेपी और कांग्रेस ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।


बीजेपी राज्य सरकार का बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन कर रही है। वो पंडालम से तिरुवनंतपुरम तक सबरीमाला विरोध यात्रा निकाल रही है जो 15 अक्टूबर को राज्य सचिवालय पर खत्म होगी। वहीं कांग्रेस कह रही है कि वो इस मामले में श्रद्धालुओं के साथ है। कांग्रेस का रुख क्या सिर्फ इस बात से तय होगा कि दूसरी पार्टी उसका चुनावी फायदा उठा लेगी या वो सिद्धांत पर आधारित होगा।


केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने इस मामले में आरएसएस पर हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि मौजूदा स्थिति का गलत फायदा उठाते हुए आरएसएस राज्य में कानून व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ा कर रहा है। उन्होंने बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर दोहरा मानदंड अपनाने का आरोप लगाया है। इस मामले में नायर सोसाइटी और नेशनल अयप्पा डिवोटी एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। लेकिन कोर्ट ने इस पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया है।


सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने बाकी जजों के फैसले पर अपनी असहमति जताई थी। उन्होंने कहा था कि धार्मिक परंपरा को समानता के अधिकार के पैमाने पर नहीं परखा जा सकता। धार्मिक रूप से कौन सी परिपाटी जरूरी है इसका फैसला श्रद्धालु करें। अगर आस्था के मसले उसके उपासक ही तय करेंगे तो फिर कोर्ट कचहरी में मामलों को ले जाने की जरूरत ही क्या है। या हम बहुसंख्यकवाद या मेजोरिटेरिएनिज्म की तरफ बढ़ रहे हैं जहां जो नंबर में ज्यादा हैं वही तय करेंगे कि क्या होना चाहिए। भले ही वो लोकतांत्रिक मूल्यों और हमारे संविधान के खिलाफ हो। ये न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाने की सोची समझी रणनीति है? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि राम मंदिर मसले पर फैसला अगर मन मुताबिक नहीं आया तो बहुसंख्यक समाज इसे भी सड़कों पर तय करेगा। और क्या फैसले संविधान के हिसाब से होंगे या जनभावनाओं के आधार पर।