Moneycontrol » समाचार » राजनीति

आवाज़ अड्डाः राहुल को आस, मायावती आएंगी साथ!

प्रकाशित Sat, 06, 2018 पर 13:35  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा इस समय एक अलग मोड़ पर चल रही है। गठबंधन का मुद्दा हो या मंदिर पॉलिटिक्स, राहुल हर मोर्चे पर अपनी राय खुलकर रख रहे हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बीएसपी से झटका मिलने के बाद भी वो निराश नहीं हैं। दिल्ली में हुई हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में राहुल गांधी ने भरोसा जताया कि लोकसभा चुनाव के लिए मायावती उनके साथ आ जाएंगी। उन्होंने बीजेपी और आरएसएस पर तीखा हमला बोला और कहा कि पूरे देश में एक पार्टी की विचारधारा को और सभी संस्थाओं पर संघ को थोपा जा रहा है। यही नहीं उन्होंने ये भी साफ कहा कि कांग्रेस को आरएसएस जैसा कैडर नहीं चाहिए।


राहुल ने मंदिर जाने के सवाल का जवाब भी दिया और अपनी राजनीति पर भी बात की। उन्होंने जीएसटी, नोटबंदी और विदेश नीति पर गंभीर सवाल भी उठाए। राहुल गांधी की बातों में एक नया कॉन्फिडेंस नजर आ रहा है । सवाल ये है कि क्या राहुल कुछ अलग तरह की राजनीति करना चाहते हैं और क्या वो सही रास्ते पर हैं?


राजनीति के अखाड़े में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का समय के साथ कॉन्फिडेंस बढ़ रहा है। यही वजह है कि मायावती भले ही मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से अलग चुनाव लड़ने का फैसला कर चुकी हैं। लेकिन राहुल गांधी को अभी भी लगता है कि खेल खत्म नहीं हुआ है। उन्हें भरोसा है कि 2019 आते-आते राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे।


एचटी लीडरशिप समिट में राहुल गांधी ने बीजेपी और RSS पर भी जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि बीजेपी को लगता है कि सिर्फ उन्हीं के लोग मंदिर जाते हैं। वो सालों से मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा जा रहे हैं। लेकिन अचानक इसे पब्लिसिटी मिलने लगी है। शायद बीजेपी को ये पसंद नहीं आ रहा। राहुल ने कहा कि देश में एक पार्टी की विचारधारा को थोपा जा रहा है।


पिछले कुछ महीनों से राहुल गांधी ने राफेल डील में भ्रष्टाचार, महंगाई, किसान और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। इसमें कांग्रेस को विपक्षी पार्टियों का साथ तो मिल रहा है, लेकिन विधानसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर बात नहीं बन पा रही है।


गठबंधन के मसले पर मायावती तेवर दिखा रही हैं। अखिलेश यादव भी बार-बार उदारता दिखाने की बात कह कर कांग्रेस को उसका फर्ज याद दिला रहे हैं। ऐसे में महागठबंधन बनने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। अब मुख्य रोल राहुल का है। क्या वो कोई ऐसा फॉर्मूला लेकर आएंगे जिससे सभी विपक्षी दलों का दिल जीत लें। सवाल ये है कि क्या राहुल की धीरे-धीरे सहयोगी दलों के बीच स्वीकार्यता बढ़ रही है। क्या वो सही रास्ते पर हैं?