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आवाज़ अड्डा: राम मंदिर बनेगा या सिर्फ बनेगा माहौल!

प्रकाशित Tue, 30, 2018 पर 08:04  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

सर्दी का मौसम आ रहा है लेकिन गर्मी बढ़ती जा रही है। राजनीति में भी और समाज में भी। अयोध्या में राम मंदिर पर सुनवाई फिर टल गई है। सुप्रीम कोर्ट जनवरी में इस मामले की सुनवाई के लिए नई बेंच का एलान करेगा, और उसके बाद फैसला, या फिर तारीख। कब तक मिलती रहेगी तारीख। ये सवाल अब बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है। एक तरफ से मंदिर समर्थक सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि अध्यादेश लाए, कानून बनाए या जो भी करे मगर मंदिर बनवाए। दूसरी ओर से भी तलवारें खिंचने लगी हैं, बयानबाजी तेज हो गई है। सवाल ये है कि अगर अदालत जल्दबाजी में फैसला नहीं सुना सकती, तो क्या सरकार के लिए भी ये आसान होगा कि वो कानून या अध्यादेश का रास्ता इस्तेमाल करके मंदिर बनवाने का रास्ता साफ करे।


अयोध्या में लोकसभा चुनाव से पहले भव्य राम मंदिर के निर्माण की उम्मीद कर रहे लोगों को बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी तक इस मामले की सुनवाई टाल दी है। कोर्ट अब जनवरी में तय करेगा कि राम मंदिर मामले की सुनवाई कब से शुरू होगी और कौन सी बेंच इस मामले को सुनेगी। आरएसएस, हिंदू संगठन और संत समाज पिछले कुछ समय से सरकार के ऊपर अध्यादेश लाने का दबाव बना रहे हैं। अब विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के निर्माण के लिए सरकार को कानून लाने का अल्टीमेटम दे दिया है।


इससे पहले बीजेपी के कई नेता राम मंदिर के लिए कानून बनाने की बात उठाते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि अब राम मंदिर के लिए इंतजार नहीं हो पा रहा। बीजेपी नेता विनय कटियार ने तो राम मंदिर मामले में सुनवाई की तारीख आगे बढ़ने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया है। राम मंदिर के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियां बीजेपी पर निशाना साध रही हैं। एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने तो सरकार को चुनौती देते हुए कहा है कि सरकार अध्यादेश क्यों नहीं लाती? जबकि कांग्रेस का कहना है कि वो कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी।


सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि वो राम मंदिर जमीन विवाद पर फैसला सुनाएगा। मंदिर मस्जिद के झगड़े में नहीं पड़ेगा। लेकिन राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं के लिए विवाद से ज्यादा आस्था का मामला है। सबरीमाला के मामले पर बोलते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि कोर्ट को ऐसे फैसले नहीं सुनाने चाहिए जो लागू ना हो सकें। सवाल ये है कि क्या कोर्ट लोगों की आस्था को ध्यान में रखकर राम मंदिर पर फैसला सुनाएगा? और अगर फैसला बहुसंख्यक समाज के हक में नहीं आया तो क्या कोर्ट के फैसले का विरोध होगा? कोर्ट जनवरी में सुनवाई की तारीख बताएगा। यानि लोकसभा चुनाव से पहले फैसला आने की उम्मीद कम हो गई है। क्या सरकार वीएचपी और आरएसएस जैसे संगठनों के आगे झुककर राम मंदिर पर अध्यादेश लाने का साहस दिखाएगी? और अगर कोर्ट में फैसला अटका रहा तो क्या 2019 में इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा?