आवाज़ अड्डा: सरकार-विपक्ष के बीच तकरार, ट्रिपल तलाक बिल पर आर-पार! -
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आवाज़ अड्डा: सरकार-विपक्ष के बीच तकरार, ट्रिपल तलाक बिल पर आर-पार!

प्रकाशित Sat, 11, 2018 पर 15:24  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

तीन तलाक का मामला एक बार फिर लटक गया है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच सहमति नहीं बनने के कारण बिल राज्यसभा में पेश नहीं हो पाया। सरकार ने इसी सत्र में बिल पास कराने के लिए उसमें तीन बदलाव भी किए थे इसके बावजूद विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। हालांकि सत्र के आखिरी दिन बिल पेश करने के सरकार के इरादे पर भी थोड़ा अटपटा लगता है। बहरहाल बीजेपी इसके लिए सीधे तौर कांग्रेस को जिम्मेदार मानती है लेकिन सवाल ये भी है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के नाम पर कहीं राजनीति तो नहीं हो रही है।


मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से आजादी के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है। संसद के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन पाने की वजह से ट्रिपल तलाक के खिलाफ बिल राज्यसभा में पेश नहीं हो पाया। कैबिनेट ने बिल में तीन संशोधनों को मंजूरी दी थी जिसके बाद इसे राज्यसभा में पेश होना था।


संशोधित बिल में भी तीन तलाक का अपराध गैरजमानती बना रहेगा। लेकिन एक बदलाव ये किया गया है कि आरोपी जमानत के लिए मजिस्ट्रेट से गुहार लगा सकता है। और मजिस्ट्रेट पीड़िता का पक्ष सुनने के बाद जमानत दे सकता है। पुलिस केवल पीड़ित पत्नी, उसके करीबी संबंधी या ससुराल पक्ष के किसी व्यक्ति की शिकायत पर ही एफआईआर दर्ज करेगी। पड़ोसी के कहने पर एफआईआर दर्ज नहीं होगी। इसके अलावा मुआवजे की रकम मजिस्ट्रेट तय करेगा। तीसरे संशोधन के मुताबिक मजिस्ट्रेट पति और पत्नी के बीच सुलह के लिए मध्यस्थता कर सकता है।


बिल में संशोधन के जरिए सरकार ने विपक्ष की आपत्तियों को शामिल करने की कोशिश की है। इसके बावजूद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बिल पर सहमति नहीं बन पा रही है। कांग्रेस कह रही है कि सरकार ने बिल में संशोधन करके विपक्ष के आगे घुटने टेक दिए हैं। ट्रिपल तलाक बिल लोकसभा में पास हो चुका है। लेकिन राज्यसभा में बिल पेश नहीं होने के पीछे बीजेपी सीधे तौर पर कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है।


सवाल ये है कि विपक्ष क्या इस बिल को लटकाने के चक्कर में है? क्या मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने से ज्यादा पार्टियों की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर है। इसलिए वो ट्रिपल तलाक बिल पर अड़ंगा डाल कर 2019 तक अपने रुख को साफ नहीं करना चाहतीं। मुस्लिम संगठन बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं कि वो महिलाओं को आगे करके उनके धार्मिक मसलों में दखल दे रही है। इसलिए बीजेपी जब निकाह हलाला और बहुविवाह का मसला उठाती है तो मुस्लिम संगठन और राजनीतिक पार्टियों की दुविधा बढ़ जाती है। क्या यही वजह है कि 2019 तक इन मुद्दों को निपटाने में किसी की दिलचस्पी नहीं है?