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आवाज़ अड्डाःबिहार में चमकी का प्रकोप, बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन!

25 साल हो चुके हैं इस बीमारी को बिहार में पैर रखे। 1995 में पहली बार वहां पहुंचा था ये बुखार।
अपडेटेड Jun 19, 2019 पर 10:04  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

25 साल हो चुके हैं इस बीमारी को बिहार में पैर रखे। 1995 में पहली बार वहां पहुंचा था ये बुखार। इतना पुराना हो चुका है कि लोगों ने उसका एक लोकल नाम ही रख दिया है। चमकी बुखार। अंग्रेजी में इसे एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम या AES कहते हैं। मगर इतनी पुरानी बीमारी आज तक काबू में नहीं आ पाई। वो भी तब जब बिहार में पंद्रह साल से सुशासन चल रहा है। विकास के आंकड़े देखें तो आप चौंक जाएंगे। मुजफ्परपुर जिले की विकास दर 28 परसेंट से ऊपर है। मगर फायदा क्या। 2012 से 2018 तक सिर्फ मुजफ्फरपुर में तेरह सौ बच्चे इस बीमारी के शिकार हो चुके थे। और इस साल फिर ये आंकड़ा एक सौ तीस के ऊपर पहुंच चुका है। साफ है कहीं कुछ नहीं, बहुत कुछ गड़बड़ है और बड़े पैमाने पर उसे दुरुस्त करने की जरूरत भी है। साफ तौर पर इस मामले में निशाने पर सरकार है, केंद्र की भी और राज्य की भी।


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए ये संकट की घड़ी है। मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में चमकी बुखार 130 से ज्यादा बच्चों को अपना शिकार बना चुका है। 17 दिन बाद जब नीतीश कुमार हॉस्पिटल का दौरा करने पहुंचे तो लोगों का गुस्सा उन पर फूट पड़ा।


मरीजों की लंबी कतार से अस्पताल बेहाल हो रहे हैं। डॉक्टरों की कमी है। बीमारी क्यों और कैसे फैल रही है इसका भी कोई पता नहीं है। मुजफ्फरपुर रसभरी लीची के लिए मशहूर है। बच्चों की मौत का इल्जाम लीची पर भी लग रहा है। लेकिन जितनी भी रिसर्च हुई है उसमें इसके ठोस सबूत नहीं मिले हैं। बहरहाल, देर से सही प्रशासन एक्शन में आ गया है।


बच्चों की मौत पर सियासत भी गरमा गई है। लोकसभा चुनाव में हार के बाद जिन विपक्षी पार्टियों ने मौन व्रत धारण कर लिया था वो अब खूब शोर मचा रही हैं। आरजेडी ने बच्चों की मौत को जाति का रंग दे दिया। आरजेडी का कहना है कि बच्चों की मौत पर राज्य सरकार का रवैया असंवेदनशील है।
 
कांग्रेस ने भी नीतीश कुमार के इस्तीफे की मांग कर दी है। केंद्र हो या राज्य सरकार, अभी तक अस्पतालों की सुध लेने वाला कोई नहीं था। मुजफ्फरपुर के हालात ने अस्पतालों में व्यवस्था की पोल खोल दी है। बच्चों की मौत के बाद केंद्र सरकार हरकत में दिख रही है। हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन पुराने वादों को दोहरा रहे हैं।


चमकी बुखार के सामने सरकार और अस्पताल सब लाचार नजर आ रहे हैं। ये तब है जबकि इस बीमारी की राज्य में लंबी हिस्ट्री रही है। मुजफ्फरपुर और आस पास के इलाके में पिछले नौ साल में ग्यारह सौ से ज्यादा मासूम बच्चों की जिंदगी ये बीमारी ले चुकी है। तो हम क्या समझें- क्या मेडिकल साइंस में चमकी बुखार या AES का कोई पक्का इलाज नहीं है या इलाज की जरूरी सुविधाएं मरीजों तक पहुंचाने की किसी को परवाह नहीं है। या बिहार जैसे पिछड़े राज्य में सौ सवा सौ बच्चों का एक मौसमी बीमारी में मर जाना किसी को हैरान नहीं करता। बिहार सरकार को भी नहीं। मंत्री नेताओं को सुन लीजिए हर कोई कह रहा है कि फलां साल में मरनेवाले की तादाद कम हो गई थी, इस बार पता नहीं ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। वगैरह वगरह। जैसे मौत के लिए बच्चे और उसके मां बाप जिम्मेदार हैं सरकार और सिस्टम तो बस यूं ही इस झमेले के बीच में फंस गए हैं। क्या यही सच है नीतीश बाबू!