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आवाज़ अड्डाः एक साथ चुनाव से किसे फायदा, किसे नुकसान!

प्रकाशित Tue, 18, 2019 पर 08:42  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

एक देश एक चुनाव। यानी पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एकसाथ हों। मसला चर्चा में कई बार आ चुका है, लेकिन अब मोदी है तो लगता कि ये भी मुमकिन है। इस बार खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी कमान संभाली है। 19 जून को उन्होंने इस मसले पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। चुनाव आयोग तो काफी पहले ही संकेत दे चुका है कि वो एक देश, एक चुनाव के लिए तैयार है। लेकिन सवाल ये है कि जिन पार्टियों को चुनाव लड़ना है वो इसके लिए कितनी तैयार हैं। एक साथ चुनाव के समर्थन और विरोध में पार्टियों के अपने-अपने तर्क हैं। किसी को इसमें केंद्र की पार्टी का फायदा दिख रहा है तो कोई इसे संविधान पर चोट बता रहा है। सवाल ये है कि क्या देशभर में लोकसभा और सभी विधानसभाओं का चुनाव एक साथ कराना सही है? और इससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या ये मुमकिन है?


संसद में 17वीं लोकसभा का कामकाज शुरू हो गया है। निर्वाचित सांसदों ने शपथ ले ली है। और इसी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश, एक चुनाव के मुद्दे को भी उठा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी पहले भी इसकी वकालत करते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने को लेकर राजनीतिक पार्टियों के बीच राय बंटी हुई है। ज्यादातर विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के अपने सावल हैं। वो मोदी सरकार की नीयत में खोट देख रही है।


दूसरी विपक्षी पार्टियां भी एक साथ चुनाव कराने के मूड में नहीं हैं। वो इसमें अपना फायदा नुकसान देख रही हैं। उनका कहना है कि लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक साथ कराना मुमकिन नहीं है।


सरकार का तर्क है कि बार-बार चुनाव होने से बेवजह वक्त और पैसा इस पर खर्च होता है। साथ ही आचार संहिता लागू होने से केंद्र और अलग-अलग राज्यों में कामकाज लंबे वक्त तक बाधित होता रहता है। योजनाओं को लागू करने की जगह नेता लोग राजनीतिक जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। लेकिन एक साफ सुथरे और आसान विकल्प के बगैर चुनावों से कैसे बचा जाएगा? क्षेत्रीय पार्टियों को इसमें अपना नुकसान नजर आ रहा है। कोई सरकार अगर साल भर के बाद गिरती है तो बचे हुए कार्यकाल का क्या होगा? तो जो सवाल देखने में आसान और आकर्षक लग रहा है उसके विकल्प भी क्या उतने ही आसान हैं? क्या जो निष्कर्ष निकलेगा वो लोकतंत्र और जनभावना का भी ख्याल रखेगा या उसके साथ खिलवाड़ होगा? कानून बनाने वालों के लिए यही बड़ा सवाल होगा?