आवाज़ अड्डा: सरकार में पैराशूट बाबुओं की एंट्री, विपक्ष को शक -
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आवाज़ अड्डा: सरकार में पैराशूट बाबुओं की एंट्री, विपक्ष को शक

प्रकाशित Fri, 15, 2018 पर 07:45  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

बड़े सरकारी पदों पर प्राइवेट सेक्टर के लोगों की भर्ती के मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि मोदी सरकार ने खास विचारधारा के लोगों को जगह देने के लिए ये रास्ता चुना है। जबकि सरकार इसे बाहर से टैलेंट लाने का तरीका बता रही है। नौकरशाह सीधे तौर पर इसका विरोध तो नहीं कर रहे लेकिन भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की वकालत कर रहे हैं। पिछली सरकारें भी बड़े पदों पर बाहर से एक्सपर्ट की नियुक्ति कर चुकी हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या विपक्ष सरकार के फैसले का बेवजह विरोध कर रहा है।


सरकार में ऊंचे पदों पर बाहर से टेलेंट लाने के मोदी सरकार के फैसले पर बड़ी बहस छिड़ गई है। सरकार ने ज्वॉइंट सेक्रेटरी स्तर के 10 पदों पर बहाली के लिए प्राइवेट सेक्टर से भी आवेदन मंगाए हैं। ये पद राजस्व, वित्तीय सेवा, आर्थिक मामले, कृषि, किसान कल्याण, सड़क परिवहन और हाइवे, शिपिंग और पर्यावरण विभाग में हैं। इन पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति तीन साल के लिए होगी। अगर प्रदर्शन अच्छा रहा तो कार्यकाल पांच साल तक के लिए हो सकता है। लेकिन विपक्षी पार्टियों को इसमें राजनीति दिख रही है। कांग्रेस का आरोप है कि इस व्यवस्था के जरिए मोदी सरकार ऐसे लोगों को ऊंचे पदों पर बैठाना चाहती है जो बीजेपी के इशारे पर काम करें।


लेकिन सरकार इसे बड़ा रिफॉर्म बता रही है। सरकार का मानना है कि इससे सरकार में नई सोच और एक्सपर्ट लोग आएंगे जिनका सरकार को फायदा मिलेगा। सरकार और विपक्ष के तर्कों के बीच ब्यूरोक्रेसी में सीधे एंट्री का मामला दलित समूहों के लिए असंतोष का नया कारण बन गया है। उनका मानना है कि इसके जरिए एससी, एसटी के लिए आरक्षण की अनदेखी हो रही है। इस मुद्दे को लेकर दलित समूहों ने भारत बंद की धमकी भी दे दी है। हालांकि नौकरशाह इस फैसले का सीधे विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की वकालत जरूर कर रहे हैं।


ऐसा पहली बार नहीं है जब सरकार में ऊंचे पदों पर बाहर से टेलेंट लाने का फैसला किया गया है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में सचिव स्तर पर 4 लोगों की नियुक्ति निजी क्षेत्र से की गई थी। जबकि खुद मनमोहन सिंह 1976 में वित्त मंत्रालय में सचिव रह चुके हैं। मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी सरकार में वित्त सचिव रह चुके हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अब मोदी सरकार के बाहर से टेलेंट लाने के फैसले पर बवाल क्यों मच रहा है। प्रोफेशनल्स की मदद से अगर सरकारी कामकाज में सुधार आता है तो इसका विरोध क्यों होना चाहिए। क्या विपक्ष के एतराज को खत्म करने के लिए ऐसी नियुक्तियों का कोई पारदर्शी और विश्वसनीय तरीका निकाला जा सकता है।