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आवाज़ अड्डा: नीतीश बीजेपी के साथ, पीछे कांग्रेस का हाथ!

प्रकाशित Fri, 13, 2018 पर 07:59  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी और जेडीयू के बीच चल रही खींचतान में नया मोड़ आ गया है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया है कि 2019 में बीजेपी बिहार में जेडीयू के साथ में चुनाव लड़ेगी । अमित शाह डिनर पॉलिटिक्स के जरिए नीतीश कुमार को साधने में लगे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि अब सीटों को लेकर बीजेपी और जेडीयू के बीच बात बन जाएगी। लेकिन बिहार में बड़े भाई का रोल कौन निभाएगा ये देखना बाकी है।


सुबह के नाश्ते पर नीतीश कुमार के साथ मुलाकात के बाद अमित शाह आश्वस्त दिखे। बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे पर मतभेद की खबरों के बीच नीतीश के साथ शाह की मुलाकात अहम मानी जा रही थी। अमित शाह कह रहे हैं कि उन्हें अपने सहयोगियों को साधना आता है। लेकिन बिहार में सवाल सिर्फ 40 लोकसभा सीटों का नहीं है। सवाल है बिहार में बीजेपी और नीतीश कुमार के भविष्य का। इसलिए दोनों पार्टियां सीटों के बंटवारे को लेकर अड़ी हुई हैं। जेडीयू 2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर सीटों का बंटवारा चाहती है। जबकि बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के दम पर ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहती है।


दरअसल, बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था। मोदी लहर में जेडीयू को इसकी कीमत चुकानी पड़ी और कुल 40 सीटों में से वो मात्र 2 सीटों पर सिमट गई। बीजेपी ने 22 सीटें जीती थीं। वहीं 2015 में जेडीयू ने आरजेडी के साथ गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा जिसमें जेडीयू को 71 और बीजेपी को 53 सीटें मिली थीं। अब एक बार फिर जेडीयू बीजेपी के साथ है।


खबरें ये भी हैं कि नीतीश कुमार एनडीए से बाहर निकलने के रास्ते भी तलाश रहे हैं। कांग्रेस इस विकल्प पर खुले दिमाग से सोचने को तैयार है। लेकिन आरजेडी ने साफ कह दिया कि महागठबंधन में नीतीश के लिए सभी दरवाजे बंद हैं। ऐसे में नीतीश के लिए ये जरूरी है कि वो बीजेपी पर दबाव तो बनाएं लेकिन बगैर किसी विकल्प के वो रिश्ता तोड़ने का रिस्क नहीं ले सकते। बीजेपी को भी पता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में राह आसान नहीं होगी। इसलिए सहयोगियों को साधकर रखना जरूरी है। ऐसे में सवाल ये है कि बिहार में सुलह के लिए क्या बीजेपी नीतीश को बड़ा भाई मान लेगी और क्या उसे उनकी मांगें मंजूर होंगी? या ये मान मुनौवल के दौर की शुरुआत भर है?