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आवाज़ अड्डाः चुनाव से पहले राहत, कितने दिन तक मिलेगा फायदा!

प्रकाशित Fri, 05, 2018 पर 08:41  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

कहते हैं देर आयें, दुरुस्त आयें। लेकिन इस वक्त ये कहा जा सकता है या नहीं,पता नहीं। आम आदमी को राहत देने के लिए सरकार ने पेट्रोल और  डीजल पर एक्साइज में कटौती कर दी है। सरकारी तेल कंपनियों से भी दाम कम करने को कहा है और राज्यों से भी अपील की गई है कि वो अपने टैक्स कम करके इतनी ही राहत और दें। वित्त मंत्री अरुण जेटली इसे गुड इकोनॉमिक्स कहकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन देर से मिली ये राहत कितने दिन टिकेगी पता नहीं।


बीजेपी सरकारें तो अपने राज्यों में दाम कम करने के एलान कर रही हैं मगर विपक्ष वाले राज्य शांत हैं। उनमें से कुछ पहले ही टैक्स घटा चुके हैं। विपक्षी पार्टियां जरूर मैदान में आकर सवाल उठा रही हैं। पांच राज्यों में चुनाव करीब हैं। ऐसे में पेट्रोल, डीजल सस्ता करके सरकार ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि सरकार विधानसभा चुनाव में हार के डर से दाम में मामूली कटौती कर रही है। वो ये भी पूछ रही है कि मोदी सरकार विदेश में सस्ता पेट्रोल, डीजल क्यों बेचती है।


सवाल ये है कि अगर तेल के दामों में बढ़त अंतर्राष्ट्रीय बाजार की वजह से है, जहां हालात काबू में आते नहीं दिख रहे तो आगे क्या होगा, दाम और बढ़े तो फिर सरकार पेट्रोल, डीजल पर इस तरह की राहत देगी या फिर इसे चुनाव से पहले राहत का लॉलीपॉप माना जाएगा?


देर से ही सही, सरकार ने पेट्रोल, डीजल की कीमतों से परेशान आम आदमी को राहत देने का एलान कर दिया है। पेट्रोल, डीजल की कीमत में ढाई रुपए प्रति लीटर की कटौती की गई है।


पेट्रोल, डीजल और सस्ता करने के लिए सरकार राज्य सरकारों से इस पर वैट घटाने के लिए भी कहेगी। राज्यों से ढाई रुपए प्रति लीटर तक कटौती करने के लिए कहा जाएगा। यानि कुल मिलाकर 5 रुपये प्रति लीटर तक की राहत मिलेगी।


सरकार के एलान के बाद खासतौर पर बीजेपी शासित राज्यों ने पेट्रोल, डीजल के दाम घटाने शुरू कर दिए हैं। इनमें से भी कुछ ने पेट्रोल पर तो कुछ ने डीजल पर ही कटौती की है। यानि लोगों को ये मामूली राहत भी पूरी नहीं मिलेगी। गैर-बीजेपी वाले राज्यों का मन अभी साफ नहीं है। कांग्रेस को ये बीजेपी की चुनावी चाल लग रही है। 


वित्त मंत्री ने साफ किया है कि पेट्रोल, डीजल के दाम घटने से मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार के ऊपर साढ़े 10 हजार करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा लेकिन इससे वित्तीय घाटा नहीं बढ़ेगा। रुपया कमजोर हो रहा है और कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है। ऐसे में गुड इकोनॉमिक्स का हवाला देकर जो सरकार अब तक कीमत में कटौती नहीं कर रही थी उसने अब ये गुंजाइश कैसे निकाल ली। क्या ये लोगों को एक चुनावी तोहफा है । लेकिन क्या ये काफी है और इसका फायदा कितना टिकाऊ है? और अपने राज्य के लोगों को राहत देने के बजाय गैर-बीजेपी शासित राज्य इसमें पॉलिटिक्स क्यों देख रहे हैं?