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आवाज़ अड्डा: नोटबंदी के नफा-नुकसान में किसका पलड़ा भारी!

प्रकाशित Sat, 10, 2018 पर 13:25  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

नोटबंदी के 2 साल पूरे हो गए। सरकार दावे कर रही है कि नोटबंदी ने बड़ा बदलाव किया है और विपक्ष आज भी इसे एक खराब फैसला बता रहा है। आज आवाज़ अड्डा में सीएनबीसी-आवाज़ आपसे पूछ रहा है कि 2 साल बाद क्या आपको लगता है कि नोटबंदी मोदी सरकार का सही फैसला था? नोटबंदी के दो साल हो गए। लेकिन समझ में नहीं आता कि इसका फायदा ज्यादा हुआ या नुकसान। एक तरफ सरकार कहती है कि नोटबंदी ने पूरी इकोनॉमी की तस्वीर बदल दी। अब सब कुछ संगठित अर्थव्यवस्था का हिस्सा है और एक-एक पैसे के बारे में पता है कि उसका मालिक कौन है। दूसरी तरफ विपक्ष कह रहा है कि नोटबंदी अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। आखिर ये बहस कब खत्म होगी? क्या 2019 के चुनाव तक इसी तरह सरकार और विपक्ष अपने अपने नतीजे निकालते रहेंगे?


2 साल पहले, नोटबंदी का एलान करते वक्त प्रधानमंत्री ने जो मकसद बताए थे और अब सरकार नोटबंदी का जो हासिल बता रही है, उसमें अंतर है। सरकार का कहना है कि नोटबंदी एक अहम कदम था। सिस्टम में अज्ञात मात्रा में कैश करेंसी थी। मुख्य रूप से बड़ी मूल्य के नोट थे। लोग पैसा बैंकों में जमा कराने पर मजबूर हुए। लोगों के संसाधन या पैसे जब्त करना मकसद नहीं था। पता लगाना था कि किसने बिना टैक्स दिए, गैर कानूनी पैसा रखा है। बैंकों में पैसा जमा होने से ये पैसा अनाम नहीं रहा। इसके मालिक का पता लग गया।


नोटबंदी के मकसद और उसकी सफलता पर यही कंफ्यूजन है। भ्रष्टाचार का धन, कालाधन और नकली नोट से शुरू हुई कहानी अब पूरी तरह डिजिटाइजेशन, फॉर्मल इकोनॉमी, टैक्स कलेक्शन पर आ चुकी है और नोटबंदी को शुरू से एक आत्मघाती कदम बता रहा विपक्ष अब इसे एक संगठित घोटाले का नाम दे रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि समय के साथ नोटबंदी के जख्म सामने आ रहे हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम कह रहे हैं कि नोटबंदी ने देश की वित्तीय हालत ऐसी कर दी गई कि अब सरकार और आरबीआई आपस में झगड़ रहे हैं। इधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी छत्तीसगढ़ की चुनावी सभाओं में लोगों को बता रहे हैं कि नोटबंदी कालाधन के खिलाफ पूरी तरह नाकाम रही और लोगों का पैसा बैंकों में जमा कराकर घोटालेबाजों में बांट दिया गया।


सवाल उठता है कि नोटबंदी क्या वाकई एक बर्बाद करने वाला फैसला था? सरकार जो फायदे गिनवा रही है क्या उन्हें पूरी तरह इग्नोर किया जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल क्या इसी कंफ्यूजन के 2019 के चुनाव में नोटबंदी एक बड़ा मुद्दा होगा? आवाज़ अड्डा इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की एक कोशिश है।