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आवाज़ अड्डा: चुनाव में गाली-गलौज से मिलेंगे वोट!

प्रकाशित Tue, 04, 2018 पर 07:28  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

प्यार और जंग में सब जायज है। ये कहावत राजनीति में भी सटीक बैठती है। इन विधानसभा चुनावों में भाषा का स्तर गिरता जा रहा है। एक दूसरे पर तीखे हमले करने के चक्कर में नेता अपनी सीमाएं भूल रहे हैं। तेलंगाना के चुनाव प्रचार में योगी आदित्यनाथ ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को बाहर खदेड़ने की धमकी दी तो ओवैसी ने भी कह दिया कि ये मुल्क उनके बाप का है। यहां से उन्हें कोई नहीं निकाल सकता। ओवैसी के छोटे भाई ने तो सभी हदें पार कर दीं। अकबरुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री मोदी का ना सिर्फ मजाक उड़ाया बल्कि उनके खिलाफ जहर भी उगला। ये सिलसिला तब थमेगा पता नहीं। लेकिन सवाल ये है कि  क्या चुनाव में जीत के लिए गंदे बयान देना जरूरी हो गया है?


योगी आदित्यनाथ और असदुद्दीन ओवैसी के बीच की जुबानी जंग बता रही है कि चुनावी भाषणों में भाषा का स्तर किस तरह गिरता जा रहा है। जैसै-जैसे चुनाव प्रचार खत्म होने का वक्त करीब आ रहा है, भाषणों में तल्खी भी बढ़ती जा रही है। तेलंगाना में हिंदू वोटरों को लुभाने के लिए बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को उतार रखा है। योगी ने ओवैसी को खदेड़ने की बात कही तो ओवैसी ने योगी के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी पर भी हमला बोल दिया।


बड़े भाई तो बड़े भाई, छोटे भाई सुभान अल्लाह। योगी और असदुद्दीन के बीच जुबानी जंग में छोटे भाई अकबरुद्दीन की एंट्री भी हो गई। छोटे ओवैसी ने प्रधानमंत्री के पद की गरिमा का ख्याल किए बगैर उनके खिलाफ जहर उगल दिया। अकबरुद्दीन ओवैसी की तीखी जुबान यहीं नहीं रुकी। एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन गया, इस बात को बीजेपी के नेता अपने भाषणों में बढ़चढ़ कर बताते हैं। अकबरुद्दीन ने चाय वाले का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी का मजाक भी उड़ाया।


चुनावी भाषणों में ओछी भाषा का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अपने भाषणों में राफेल डील का हवाला देकर प्रधानमंत्री मोदी को चौकीदार चोर कहकर संबोधित कर रहे हैं। वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली राहुल गांधी को मसखरा राजकुमार कहकर बुलाते रहे हैं। सवाल ये है कि क्या चुनाव में जीत हासिल करने के लिए ओछे बयान देना जरूरी हो गया है। वोट हासिल करने के लिए एक दूसरे के प्रति जिस भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, क्या उससे आपसी नफरत नहीं बढ़ेगी। क्या नेताओं के पास सार्थक आइडिया का अकाल हो गया है? या ऐसी छिछली भाषा से लोगों की भावनाओं को उभारना और उनका वोट हासिल करना आसान होता है। अगर ये आसान रास्ता है तो फिर विकास और जनता के सरोकार जैसी बोझिल बातों में लोगों को उलझाने की मशक्कत कोई क्यों करे?