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आवाज़ अड्डाः चुनाव से पहले गरम हुआ मंदिर का मुद्दा

प्रकाशित Thu, 03, 2019 पर 08:10  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण संविधान के दायरे में होना चाहिए या हिंदू संगठनों के दबाव में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफाई के बाद ये सवाल खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद सरकार के ऊपर कानून लाने का दबाव बना रहा है। जबकि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है। मामला लंबा खिंच रहा है, इसमें कोई शक नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि अगर सरकार तीन तलाक के मामले पर अध्यादेश ला सकती है तो राम मंदिर पर क्यों नहीं। सवाल ये है कि संत समाज की बेसब्री ज्यादा अहम है या संविधान के दायरे में राम मंदिर का निर्माण। और क्या सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले राम मंदिर पर अध्यादेश लाना चाहिए?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इंटरव्यू में राम मंदिर पर अध्यादेश लाने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करने की बात कही है। लेकिन संत समाज मोदी जी की राय से इत्तेफाक नहीं रखता। विश्व हिंदू परिषद अभी भी राम मंदिर के निर्माण के लिए कानून की मांग पर अड़ा हुआ है।


विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस राम मंदिर के निर्माण के लिए आंदोलन चला रहे हैं। वो सरकार के ऊपर जल्द से जल्द कानून लाने का दबाव बनाते रहे हैं। सरकार से अब भी आरएसएस की उम्मीद बनी हुई है।


मोदी ने कांग्रेस के ऊपर राम मंदिर मामले की सुनवाई में रोड़े अटकाने का आरोप लगाया। कांग्रेस का कहना है कि राम मंदिर का मामला कोर्ट में है। कोर्ट का जो भी फैसला आए उसे सभी पक्षों को मानना चाहिए। सरकार को इसे लागू करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।


चार जनवरी को सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि राम मंदिर मामले की सुनवाई कब से शुरू होगी। कोर्ट सिर्फ जमीन विवाद पर फैसला देगा। प्रधानमंत्री ने राम मंदिर पर सफाई देकर कोर्ट के फैसले से पहले कानून लाने की मांग को ठंडा करने की कोशिश की है। यहां सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री की सफाई के बाद उन पर कानून बनाने के लिए दबाव डालना सही है? सवाल ये भी है कि राम मंदिर को लेकर क्या बीजेपी और आरएसएस के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं? और क्या मंदिर को लेकर ये बेचैनी इसलिए भी है क्योंकि अगर कोई एक्शन नहीं हुआ तो लोकसभा चुनाव में इसका नुकसान बीजेपी को हो सकता है?