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आवाज़ अड्डा: कितना लंबा खिंचेगा राम मंदिर विवाद!

प्रकाशित Sat, 05, 2019 पर 13:15  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

अयोध्या में जमीन विवाद का मसला कोर्ट में वैसे ही चल रहा है जैसा हम सिविल मुकदमों की सुनवाई के बारे में सुनते आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अगली तारीख 10 जनवरी की लगा दी है। उस दिन ये तय हो जाएगा कि कौन सी बेंच इसकी सुनवाई करेगी और क्या वो रोजाना सुनवाई करके इसका जल्दी निपटारा करेगी। दिक्कत ये है कि कानूनी नजरिये से कोर्ट जिसे जमीन टाइटल का मामला मान रहा है वो अदालत के बाहर करोड़ों लोगों के लिए आस्था का मसला है। क्योंकि जमीन विवाद सुलझे तो फैसले के मुताबिक या दूसरे कानूनी रास्ते मंदिर का निर्माण शुरू हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और संत समाज पहले ही कह चुके हैं कि सरकार अब इंतजार ना करे और अध्यादेश लाए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से आनन फानन में नई तारीख लगा दी उसके बाद इस मांग ने और जोर पकड़ा है। सवाल है कि अध्यादेश का विकल्प क्या इतना आसान है और अगर है तो फिर क्या सरकार ही इससे पीछे हट रही है। राम मंदिर कब बनेगा ये तो अभी तय नहीं है लेकिन लगता है 2019 के लिए ये मुद्दा जरूर बन जाएगा।


राम मंदिर मामले पर जल्दी सुनवाई की आस लगाए बैठे संत समाज को झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई एक बार फिर 10 जनवरी तक टाल दी है। अब तीन जजों की बेंच 10 जनवरी को तय करेगी कि राम मंदिर मामले की सुनवाई कब शुरू होगी। सुनवाई रोजाना हो या नहीं इसका फैसला भी यही बेंच करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में राम मंदिर मामले की तुरंत सुनवाई की याचिका ठुकरा दी थी और जनवरी की तारीख दी थी। उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट इस बार सुनवाई की तारीख तय कर देगा। लेकिन कोर्ट ने एक और तारीख देकर सरकार की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है। लोकसभा चुनाव करीब हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि राम मंदिर फिर से चुनावी मुद्दा बनेगा। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मानना है कि लोकसभा चुनाव में राम मंदिर मुद्दा नहीं होगा। बल्कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, इकोनॉमी की खस्ता हालत, युवाओं की उम्मीदें जैसे मुद्दे छाए रहेंगे। हालांकि आरएसएस और वीएचपी सरकार के ऊपर लगातार कानून बनाने का दबाव डाल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला का कहना है कि मंदिर का मसला बातचीत से सुलझना चाहिए।


मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी दोनों पक्षों को मामला बातचीत के जरिए सुलझाने की सलाह दी थी। लेकिन उसकी कोई सार्थक पहल नहीं हुई। सवाल ये है कि जो लोग कोर्ट के विचाराधीन मामले पर कानून बनाने की मांग कर रहे हैं क्या उसमें सरकार का कोई रोल बनता भी है? सुप्रीम कोर्ट इसे संबद्ध लोगों के बीच जमीन के मालिकाना हक का मामला मान रहा है। हिंदुओं की आस्था के नाम पर कोर्ट के फैसले से पहले क्या सरकार अध्यादेश या कानून ला सकती है? अगर ऐसा किया गया तो क्या इससे विवाद सुलझेगा या और बढ़ेगा? और क्या जनभावना को ध्यान में रखकर अब कोर्ट को इस मामले को नहीं निपटा देना चाहिए?