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आवाज़ अड्डा: चुनाव में उठेंगे जनता से जुड़े मुद्दे!

प्रकाशित Wed, 09, 2019 पर 07:51  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

इस बार के लोकसभा के चुनाव में क्या चलेगा और क्या नहीं चलेगा? कहना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है। जब विश्लेषण करने वालों का ये हाल है तो समझना मुश्किल नहीं है कि पार्टियों के लिए ये कितनी बड़ी परेशानी होगी। राजनीति में जो चल रहा है उससे इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है कि लोकसभा चुनाव में क्या मुद्दा बनेगा। मोदी सरकार अपनी दर्जनों योजनाएं गिनाती रही है। विपक्ष मान के चल रहा है कि सरकार ने जुमले ज्यादा गढ़े हैं और योजनाओं पर काम कम हुआ है। लेकिन चुनाव के पास पहुंचते-पहुंचते इस कहानी में कई उतार चढ़ाव देखने को मिलेगा। इसकी एक मिसाल है सामान्य वर्ग के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10 फीसदी का रिजर्वेशन और चुनाव तक अगर कुछ ऐसे एलान होते हैं तो इस पर ताज्जुब करने की जरूरत नहीं है। सवाल है कि सरकारी फरमानों से लेकर चुनावी मेनिफेस्टो तक पार्टियां अपनी अपनी सुविधा से किन मुद्दों को उछालेंगी।


सामान्य वर्ग के लिए रिजर्वेशन के फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। बीजेपी उस सवर्ण वोट को गोलबंद करने में कामयाब होगी जो परंपरागत तौर पर उसके साथ रहा है। लेकिन हाल के दिनों में एससी-एसटी कानून पर मोदी सरकार के नरम रवैये से नाखुश थे। कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी पार्टियां सरकार की नीयत पर सवाल तो उठा रही हैं लेकिन इस संविधान संशोधन बिल का समर्थन करने के लिए मजबूर हैं। सत्ता पक्ष इन पार्टियों को देश के गरीबों से किए गए उनके वादे की याद दिला रहा है।


रिजर्वेशन तो सबसे ताजा कार्ड है। चुनावी समर जीतने के लिए कौन से हथियार निकलेंगे इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। किसानों और युवाओं का ख्याल रखते हुए कुछ खास स्कीम की उम्मीद जताई जा रही है। छोटे कारोबारियों को भी रियायत देने का एलान किया जा सकता है। सरकार का फोकस इस पर रहेगा कि जो काम चुनाव के करीब किए जाएं उसकी गूंज देर तक सुनाई दे। यानी चुनाव तक वो लोगों को याद रहे। राम मंदिर गोरक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दे तो हैं ही। वैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मानना है कि चुनाव में राम मंदिर मुद्दा नहीं होगा। बल्कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, इकोनॉमी की खस्ता हालत, युवाओं की उम्मीदें जैसे मुद्दे छाए रहेंगे। तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस किसानों का कर्ज माफ करने का एलान करके चुनाव जीत चुकी है। वो लोकसभा चुनाव में भी किसानों की बदहाली और बेरोजगारी को मुद्दा बना रही है।


दिलचस्प बात है कि बीजेपी जिन मुद्दों को अपना मजबूत पक्ष मानती है उससे उसके कुछ सहयोगी किनारा करते नजर आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साफ कर चुके हैं कि राम मंदिर और तीन तलाक जैसे विवादित मुद्दों से जेडीयू का कोई लेना देना नहीं है। दोनों मुद्दों का हल बातचीत और सर्वसम्मति से निकलना चाहिए। राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की भी कुछ ऐसी ही राय है।


सवाल है कि 2014 में जो मोदी मैजिक था क्या 2019 में उसमें उतना ही दम बचा है। 5 साल के कामकाज का ब्यौरा लोगों के सामने होगा ये मोदी के पक्ष में भी जा सकता है और उनके खिलाफ भी। क्या ऐसे में चुनाव के पास कमंडल वाली पार्टी की नैया मंडल फॉर्मूले की पतवार से पार लगेगी। इससे बड़ा सवाल ये है कि क्या सिर्फ विकास के दम पर चुनाव जीता जा सकता है। या वोटरों को लुभाने के लिए लुभावने वादे जरूरी हैं? राम मंदिर और तीन तलाक जैसे मुद्दे अगर जिंदा रहते हैं तो इससे बीजेपी को नुकसान नहीं होगा। सवाल है कि क्या विपक्ष इसका मुकाबला करने के लिए कोई बड़ा नैरेटिव खड़ा कर पाएगा? आवाज़ अड्डी इन्ही सवालों के जवाब खोजने की एक कोशिश है।