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आवाज़ अड्डा: 2019 में चलेगा विपक्ष का गठबंधन!

प्रकाशित Sat, 27, 2018 पर 12:29  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

क्या कड़े फैसले लेने के लिए केंद्र में मजबूत सरकार का होना जरूरी है या फिर सीधे कहें तो एक पार्टी के बहुमत वाली सरकार जरूरी है, लोकसभा चुनाव के संदर्भ में ये मुद्दा फिर गरमा रहा है, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ऐसा ही मानते हैं उनका मामना है कि कड़े फैसले लेने के लिए ताकतवर सरकार चाहिए लेकिन इतिहास में कई बार गठबंधन की सरकारों ने बड़े फैसले लिए हैं तो फिर ये सवाल क्यों उठाया जा रहा है, क्या डोभाल का इशारा मोदी बनाम रेस्ट की ओर है और वो मोदी विरोध के नाम पर एकजुट होने वाली पार्टियों के गठबंधन से बचने को कह रहे हैं, आज आवाज अड्डा में इसी पर चर्चा करेंगे कि क्या गठबंधन की सरकारें इस दौर में नाकाम रहेंगी, ध्यान रहे कि 2014 के बाद से राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकारें ही ज्यादातर बनीं हैं, आइये देखते हैं एक रिपोर्ट उसके बाद चर्चा करेंगे।


लोकसभा चुनाव से पहले सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच मजबूत बनाम मजबूर सरकार को लेकर बहस बढ़ती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए 2019 में दोबारा सरकार बनाने की कोशिश में जुट गया है। इसके लिए नए पार्टनर भी ढूंढे जा रहे हैं। इसी बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा है कि देश में अगले 10 साल तक एक मजबूत सरकार की जरूरत है। डोभाल के मुताबिक आने वाले समय में भारत सॉफ्ट पावर बनकर नहीं रह सकता।


कमजोर गठबंधन सरकार की बात कहकर डोभाल 2019 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत देने की वकालत कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि कमजोर गठबंधन वाली सरकारें बोल्ड फैसले लेने में सक्षम नहीं होतीं और अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पातीं। इसमें कार्यकाल पूरा ना करने की बात तथ्य के तौर पर अगर सही मान लें तो फैसले ना लेने की बात पर बहस की पूरी गुंजाइश है। 1989 से 91 के बीच हमने वीपी सिंह और चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनते देखा। सरकारें टिकी नहीं लेकिन इसी दौर में वीपी सिंह ने पिछड़ी जातियों को रिजर्वेशन देने के लिए मंडल कमिशन की सिफारिशों को लागू करने का बड़ा फैसला कर डाला। देश को लोन डिफॉल्ट से बचाने के लिए सोना गिरवी रखने का फैसला चंद्रशेखर के जमाने में हुआ था। कमजोर गठबंधन के साइड इफेक्ट के तौर पर इसका जिक्र बार-बार होता है।


1991 में कांग्रेस को पूरा बहुमत नहीं मिला था। लेकिन नरसिम्हा राव को ये श्रेय जाता है जिन्होंने एक माइनोरिटी सरकार को 5 साल तक चला कर दिखाया। यही नहीं आर्थिक हालात को सुधारने के लिए रिफॉर्म का सिलसिला भी राव के दौर में ही शुरू हुआ। ये ऐसा अलोकप्रिय फैसला था जिसे पूर्ण बहुमत वाली सरकारें भी टालती रही थीं। 1996 में भी किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। त्रिशंकु लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी बहुमत साबित नहीं कर पाए। बाद में यूनाइटेड फ्रंट की सरकारों में एच डी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने।


जो लोग गठबंधन सरकारों की अस्थिरता की मिसाल देते हैं उनका इशारा खासतौर इसी दौर की अनिश्चतता से होता है। बाद में औपचारिक तौर पर बने गठबंधनों की सरकारों को हमने चलते देखा है जिसमें वाजपेयी की सरकार से लेकर मनमोहन सिंह के दो कार्यकाल और अब नरेंद्र मोदी की सरकारें शामिल है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल जब कमजोर गठबंधन की बात करते हैं तो उनका इशारा बीजेपी के खिलाफ खड़े हो रहे महागठबंधन से होता है। पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली भी ऐसे मौकापरस्त गठबंधन को खारिज करने की बात कर चुके हैं।


बीजेपी ने 2014 में बहुमत के साथ सरकार बनाई। राजनीति में सहयोगियों की जरूरत पड़ती है इसलिए उन्हें भी साथ में रखा। कुछ सर्वे इशारा कर रहे हैं कि 2019 में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलेगा और गठबंधन की सरकार बनेगी। गठबंधन अभी भी है लेकिन इसमें बीजेपी एक बड़ी पार्टी है जिस पर उसके सहयोगी दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहते। वहीं दूसरी तरफ जिन विपक्षी पार्टियों के महागठबंधन की बात हो रही है उसमें सबकी आकांक्षाएं अलग-अलग हैं। वो नेता अपना हित देखेंगे या देश का।


महत्वाकांक्षाओं के इसी टकराव के कारण शायद अभी तक ये गठबंधन नहीं बन पाया है। इन सब खामियों के बावजूद सवाल यही है कि क्या वाकई में गठबंधन की सरकार देश के लिए हानिकारक है? क्या एक बड़ी पार्टी वाली सरकार के लिए बोल्ड फैसले लेना आसान होता है। लेकिन क्या ऐसी सरकार के निरंकुश होने का अंदेशा भी ज्यादा नहीं रहता क्या। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को भी जगह मिले तो इसमें देश की एकता मजबूत होगी या कमजोर? अजीत डोभाल ने महागठबंधन बनने से पहले इस मुद्दे पर बहस छेड़ दी है। इसी मुद्दे पर यहां हो रही है बड़ी बहस।