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गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली की चुनाव यात्रा

प्रकाशित Wed, 24, 2019 पर 11:26  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

रायबरेली, जहां से यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद खड़ी हैं वहां आज भी गांधी परिवार के प्रति वफादारी जताने वालों की कोई कमी नहीं है। लोग ये भी कहते हैं कि गांधी परिवार से ही रायबरेली की पहचान है। लेकिन इस बार बीजेपी ने सोनिया के पूर्व सहयोगी दिनेश प्रताप को टिकट दिया है।


रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में आम तौर पर लोगों की दिलचस्पी इस बात में नहीं होती है कि जीत किसकी होगी बल्कि चर्चा इस बात पर होती है कि कितने वोटों के अंतर से जीत होगी। लेकिन इस बार माजरा कुछ और है क्योंकि इस बार चुनावी मैदान में सोनिया गांधी के खिलाफ गांधी परिवार के ही करीबी माने जाने वाले नेता खड़े हैं जो हाल ही में कांग्रेस छोड़कर आए हैं।
 
इस बार रायबरेली की पहेली इमरतियों की तरह है, रसदार लेकिन अबूझ। कहते हैं इंदिरा गांधी जब भी यहां से गुजरती थीं, इमरती खाना नहीं भूलतीं थीं। गांधी परिवार से जुड़े ऐसे किस्से बताने वाले लोग रायबरेली में आपको आसानी से मिल जाएंगे। गांधी परिवार के साथ यही भावनात्मक रिश्ता है जिसने मोदी लहर में भी सोनिया गांधी को 2.5 लाख ज्यादा से वोटों के अंतर से जीत दिलाई थी और आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो उनकी हार के बारे में सोच भी नहीं सकते।
 
लेकिन आप जैसे जैसे रायबरेली के लोगों से मिलना जुलना और बातें करना शुरू करते हैं, आपको एहसास होने लगता है कि गांधी परिवार के साथ भावनात्मक रिश्ता अब बहस का विषय बन चुका है। गांधी परिवार और रायबरेली के रिश्तों के इसी फीकेपन पर बीजेपी ने जीत की उम्मीद बांध रखी है और अब इस उम्मीद को दमदार उम्मीदवार का सहारा भी मिल गया है। कभी गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे दिनेश प्रताप सिंह का पूरा परिवार स्थानीय राजनीति में सक्रिय है। 1996 में कांग्रेस के बागी नेता को टिकट देकर भाजपा ने पहली बार यहां से जीत दर्ज की थी। आडवाणी युग के उसी सियासी दांव को इस बार अमित शाह ने दोहराया है। 2017 में रायबरेली के 5 विधानसभा क्षेत्रों में से दो पर जीत दर्ज कर चुकी बीजेपी के हौसले पहले से ही बुलंद हैं।


लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार सोनिया गांधी के खिलाफ बीजेपी के टिकट पर लड़ने वाले उम्मीदवार अपना टिकट कटने से खासे नाराज हैं। इस बार बीजेपी का उम्मीदवार राजपूत होने से भी बीजेपी के परंपरागत ब्राह्मण वोट के खिसकने का खतरा बताया जा रहा है। इतना ही नहीं 2014 में बीएसपी और कांग्रेस अलग अलग लड़ी थीं। लेकिन इस बार कांग्रेस को एसपी-बीएसपी का भी साथ है। लेकिन बीजेपी उम्मीदवार इन दलीलों को खारिज करते हैं। नतीजा जो भी हो लेकिन भाजपा ने यहां का मुकाबला दिलचस्प जरूर बना दिया है।