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चुनाव अड्डाः चुनाव आगे बढ़ रहा है, मुद्दे गायब हो रहे हैं?

प्रकाशित Fri, 19, 2019 पर 12:02  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

95 लोकसभा सीटों पर मतदान पूरा हो गया। दक्षिण भारत की करीब करीब आधी सीटें इनमें शामिल हैं। दूसरे चरण की इस वोटिंग के साथ लोकसभा की 543 में से 186 यानी एक तिहाई सीटों पर मतदाता का फैसला ईवीएम में बंद हो गया। पिछली बार यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 66 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। इस बार पहले चरण में 70 प्रतिशत के आसपास वोट पड़े और आज भी अच्छा मतदान हुआ है। ऐसा लग रहा है कि इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले मतदान का अनुपात बढ़ेगा। बड़ा सवाल है कि इसमें क्या संकेत छिपा है?


दूसरे चरण में 11 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश की 95 सीटों पर वोटिंग कमोबेश शांतिपूर्ण रही। पश्चिम बंगाल और मणिपुर से हिंसा की छिटपुट घटनाएं रिपोर्ट हुईं, लेकिन कोई बड़ी घटना नहीं हुई। पहली वार वोट देने वालों से लेकर बुजुर्गों तक ने पूरे उत्साह से अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दूसरे चरण में राज बब्बर, हेमा मालिनी जैसे स्टार पॉलिटिशियन से लेकर फारूख अब्दुल्ला, एच डी देवगौड़ा, सुशील कुमार शिंदे और तारिक अनवर जैसे राजनीति के दिग्गज मैदान में हैं। दूसरे चरण में 52 सीटों पर वोटिंग के साथ दक्षिण भारत में बड़ा हिस्सा वोट कर चुका। 7 चरणों में चुनाव वाले यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के रुझान पर भी बात होने लगी है। सबसे बड़े दारोमदार उत्तर प्रदेश में है, जहां सपा-बसपा का गठबंधन सबसे ज्यादा सीटों का दावा कर रहा है।


इधर प्रचार के मोर्चे पर ऊपर से तो राष्ट्रवाद, राफेल, न्याय योजना, रोजगार जैसे मुद्दे ही दिखाई देते हैं। लेकिन अब एक दूसरे के मुद्दों पर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं। बीजीपी कांग्रेस के घोषणापत्र को राष्ट्र विरोधी तत्वों को बढ़ावा देने वाला ढकोसलापत्र बता रही है। राहुल गांधी ने नीरव मोदी, ललित मोदी और नरेंद्र मोदी का नाम लेकर कहा था सारे चोरों के नाम मोदी ही क्यों होता है? जाति से जुड़े उपनाम को पकड़कर अब प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि राहुल सभी पिछड़ों को गाली दे रहे हैं।


वहीं ममता बनर्जी कह रही हैं कि यूपी और बंगाल मिलकर केंद्र का भविष्य तय करेंगे। अकेले कांग्रेस की सरकार नहीं बनने जा रही है।
सवाल उठता है कि चरण दर चरण पक्ष-विपक्ष में जो तल्खी बढ़ रही है क्या वो किसी कंफ्यूजन का नतीजा है? दो चरण के बाद यूपी में सपा-बसपा का महागठबंधन कितना प्रभावी दिखता है? दक्षिण भारत के मतदाता किसका साथ दे रहे हैं? क्या मोदी लाओ और मोदी हटाओ के अलावा भी कुछ मुद्दे काम कर रहे हैं?