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मध्य प्रदेश चुनाव पर सीएनबीसी-आवाज़ की ग्राउंड रिपोर्ट

प्रकाशित Sat, 24, 2018 पर 16:02  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

मध्य प्रदेश चुनाव के लिए प्रचार तूफानी दौर में है। नेताओं की बयानबाजी आग लगा रही है लेकिन जमीन के मुद्दे कहां हैं? इसी तलाश में सीएनबीसी-आवाज़ की टीम निकली ग्राउंड जीरो पर। आपको याद होगा कि इसी मध्य प्रदेश में मंदसौर कांड हुआ और किसानों की जान गई और इसी मध्य प्रदेश की भावांतर स्कीम पर देश भर में चर्चा हो रही है तो अब क्या चाहता है मध्य प्रदेश का किसान, आइए जानते हैं।


किसानों की नजर  से देखें तो मध्य प्रदेश में सिर्फ हवा हवाई मुद्दे छाए हुए हैं और किसान घोषणा पत्र तक सिमट कर रह गया है। किसी भी राजनीतिक दल ने किसानों तक पहुंच कर उनका दर्द समझने और बांटने की कोशिश नहीं की। शायद बीजेपी ये सोच रही है कि शिवराज सरकार ने जो योजनाएं चलाई हैं उससे किसान खुश हैं। लेकिन हकीकत जाननी है तो उस योजना के बार में जानिए जिसे ब्याज जीरो शिवराज हीरो नाम से प्रचारित किया गया। इस योजना के तहत किसानों सहकारी बैंक से 0 फीसदी ब्याज पर लोन दिया गया। लेकिन ये लोन अब किसानों को छल रहा है।


शिवराज हीरो ब्याज जीरो वह योजना है जिसके तहत किसानों को सरकारी बैंकों से जीरो फीसदी ब्याज पर लोन दिया जाता है। मगर किसानों को क्या फायदा होता है बात करते हैं योजना के ही 1 लाभार्थी से जिसने बताया कि उसने 1 लाख का लोन लिया उसमें कुछ की बीज, खाद ली 0 फीसदी ब्याज पर मिल गया लेकिन समय से चुका नहीं पाया क्योंकि रबी की फसल बिकते बिकते अप्रैल मई का महीना आ गया। जबकि पैसा मार्च तक लोन चुकाना होता है। इसलिए 15 फीसदी की पैनल्टी लग गई।


तो किसान ने लोन लेकर फसल तैयार की। फसल सरकार ने खरीदी लेकिन पैसा मिला नहीं और लोच चुकाने की तारीख आ गई। ऐसे में किसान 15 फीसदी तक की पेनल्टी चुकाने के लिए मजबूर है। यही नहीं लोन लेने पर उसे 3 फीसदी फसल बीमा के तौर पर भी चुकाना होता है। मतलब सरकारी भुगतान में देरी हुई तो किसान को मूलधन पर 18 फीसदी की चपत लगती है। यहां से निकल कर हम पहुंचे सीहोर जिले की सबसे बड़ी आष्टा मंडी में। जानने की कोशिश की कि भावांतर योजना जिसका मध्य प्रदेश ही नहीं देश देश में प्रचार किया जा रहा है उसकी जमीनी हकीकत क्या है। मध्य प्रदेश के किसानों की जितनी सुनहरी तस्वीर पेश की जा रही है उतनी है नहीं। हालांकि इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सरकार ने किसानों के लिए प्रयास किए हैं पर उसका फायदा बेहतर ढंग से किसानों तक पहुंचता हुआ नहीं दिख रहा है।


मध्य प्रदेश में उद्योगों की बात करें तो पहला नाम आता है धार के पीथमपुर इंडस्ट्रियल टाउनशिप का। वहां बड़े कारोबारी अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्योगपतियों का दम निकाल दिया है। जीएसटी के दौर में भी भ्रष्टाचार जारी है। इनसे राहत नहीं मिली तो बीमार उद्योगखत्म हो जाएंगे।


किसानों के लिए आज अगर फसल के सही दाम और कर्ज बड़ा मुद्दा है तो नौजवानों के लिए रोजगार बड़ा सवाल है। मध्य प्रदेश में बेरोजगारी की परतें खोलने पर पता लगता है कि समस्या बहुत गहरी है। उद्योग-व्यापार का माहौल जब तक ठीक नहीं होगा, बेरोजगारी दूर करना संभव नहीं।


15 साल से बीजेपी का गढ़ रहे मध्य प्रदेश में इस बार उलटफेर की उम्मीद की जा रही है। लेकिन बीजेपी को बनाए रखने या बदल देने का सूत्रधार होगा मध्यप्रदेश का युवा। और युवाओं के बीच सबसे बड़ा मुद्दा है रोजगार का। यहां जिस तादाद में रोजगार खोज रहे युवाओं की फौज तैयार हो रही, उस तादाद में ना तो प्राइवेट नौकरियां बढ़ रही हैं और ना सरकारी।


संख्या के लिहाज से सरकारी नौकरियों की सीमा है। पर व्यापमं जैसा घोटाला देख चुके राज्य में प्राइवेट नौकरियों का तो और भी टोटा है। उम्मीद की जा रही थी कि नए दौर में उद्योग व्यापार को रफ्तार मिलेगी तो नौकरियां भी पैदा होंगी। मगर इंडस्ट्री की हालत पतली है। प्रदेश में चार बड़े इंडस्ट्रियल एरिया है मंडीदीप, टीकमपुरा, मालिनपुरा और बामोर। यहां के सबसे बड़े इंडस्ट्रियल एरिया मंडीदीप में जाकर पता लगता है कि बुनियादी सुविधाओं, कनेक्टिविटी और मार्केट का घोर अभाव है। इन्वेस्टर सम्मिट और कंपनियों को जमीनें आवंटित हुईं तो लगा कि बदलाव आएगा। लेकिन हालात जस के तस रहे और निवेश के वादे जमीन पर नहीं उतर पाए।


सरकारी नौकरी नहीं, इंडस्ट्री में दम नहीं तो फिर ले दे कर बचता है व्यापार। यहां व्यापारी वर्ग आज भी शिवराज सरकार के प्रति पुरउम्मीद है। लेकिन परेशानियों की बात करें तो सामने पहाड़ नजर आता है। साफ है राजनीतिक दलों को अगर मध्य प्रदेश के युवाओं का दिल जीतना है तो उसका रास्ता नए निवेश उद्योग और बेहतर व्यापारिक संभावनाओं से खुलता है। चुनावी घोषणा पत्र में युवाओं की बात तो की गई है मगर रोजगार दिलाने का रोडमैप किसी भी पार्टी ने प्रस्तुत नहीं किया है।


सवाल व्यापार का हो या फिर रोजगार का, सरकार की बड़ी भूमिका है। लेकिन सरकारी संस्थाओं का भ्रष्टाचार इसकी धार कुंद कर रहा है। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला भी कई बार पूरे देश की सुर्खियां बना। लेकिन चुनाव में इसपर खास बात नहीं हो रही है। मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा बोर्ड यानी व्यापम मैं बैठे अधिकारियों ने परीक्षा पास कराने के लिए घूस खाई। मूल परीक्षार्थी की जगह किसी और से परीक्षा दिलवाई, नकल कराई गई, आंसर सीट खाली छोड़ कर दूसरों से भरवाई गई इसके बाद भी पैसा खिलाने वाला छात्र पास नहीं हुआ तो उसके नंबर बढ़ा दिए गए। यही वजह है कि 10 सालों में मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले योग्य और अयोग्य सारे छात्रों को संदेह की नजर से देखा जाता है। मगर सवाल है कि चुनाव में व्यापम मुद्दा क्यों नहीं। साफ है कि व्यापम की चर्चा आते ही, सारी पार्टियां घिरने लगती हैं। यानि राजनीतिक रूप से मुद्दा बीजेपी या कांग्रेस के हक में नहीं है, इसलिए ये चुनाव में पार्टियों का मुद्दा भी नहीं है।