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कांग्रेस-NCP से बनेगी शिवसेना की बात, अब महाराष्ट्र में सरकार बनाने का क्या होगा फॉर्मूला?

शिवसेना और NCP महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की आलोचना जरूर कर रहे हैं लेकिन सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर रहे हैं।
अपडेटेड Nov 14, 2019 पर 12:48  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

महाराष्ट्र में सरकार बनाने का खेल उलझता जा रहा है, शिवसेना और NCP महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की आलोचना जरूर कर रहे हैं लेकिन सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर रहे हैं, या कहें कि किसी के पास 145 विधायकों की लिस्ट नहीं है, NCP और कांग्रेस आपस में ऐसा प्लान बना रहे हैं जो शिवसेना से साझा नहीं कर रहे हैं जबकि शिवसेना को भरोसा है कि मुख्यमंत्री तो उनका ही बनेगा, ये एक ऐसी उलझी हुई कहानी है जिसमें कौन किसको ट्रैप कर रहा है समझना मुश्किल है, लेकिन एक चीज जो दिख रही है वो ये है कि शिवसेना अपने ही खेल में फंस गई है, बीजेपी से नाता तोड़ कर इतना आगे निकल गई है कि उसके लिए आगे कुआ पीछे खाई जैसी स्थिति है, कल शाम प्रेस कांफ्रेंस में उद्धव ठाकरे की बॉडी लैंग्वेज से ऐसा ही लग रहा था। बहरहाल, पिक्चर अभी बाकी है ये तो इंटरवल है, इस बीच 19 दिन बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एंट्री की और कहा कि सरकार बनाने के लिए विपक्ष के पास 6 महीने का समय है, विपक्ष सरकार बनाए। क्लाइमेक्स में कौन बाजी मारेगा ये देखने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।


महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में हर रोज एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र में भले ही राष्ट्रपति शासन लग गया है, लेकिन सरकार बनाने का खेल लगातार चल रहा है। शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के अंदर बैठकों का दौर चल रहा है। कांग्रेस और एनसीपी ने एक कमिटी बनाई है जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम और आगे की रणनीति पर सुझाव देगी। एनसीपी के नेता अजित पवार को नया साल शुरू होने से पहले सरकार बनने की उम्मीद है।


पर्दे के पीछे अलग-अलग फॉर्मूलों पर चर्चा हो रही है। एक फॉर्मूला ये भी है कि शिवसेना और एनसीपी का ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री हो,  लेकिन कांग्रेस का डिप्टी सीएम पूरे पांच साल रहे। खबर है कि कांग्रेस मंत्री पदों में बराबर की भागीदारी चाहती है। शायद इसलिए भी समय ज्यादा लग रहा है।


सत्ता के इस खेल में शिवसेना बीजेपी का साथ छोड़ काफी आगे निकल गई है। संजय राउत अभी भी शिवसेना का मुख्यमंत्री बनने का दावा कर रहे हैं। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर कांग्रेस के नेताओं की उद्धव ठाकरे से मुलाकात हो गई है। उद्धव का कहना है कि चर्चा सही दिशा में आगे बढ़ रही है। इधर बीजेपी भी राज्य में सरकार बनाने को लेकर एक्टिव हो गई है। नारायण राणे कह रहे हैं कि बीजेपी बहुमत का आंकड़ा जुटाने में लगी हुई है।


लेकिन बीजेपी के लिए परेशानी की बात ये है कि शिवसेना के बागी तेवर से दूसरे सहयोगियों का भी हौसला बढ़ गया है। इसका सीधा असर झारखंड चुनाव पर दिख रहा है। वहां बीजेपी की सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन और लोक जनशक्ति पार्टी ने अलग चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। झारखंड में जेडीयू पहले भी बीजेपी से अलग थी। इस बार भी अलग है।


इन घटनाओं से ये सवाल खड़ा होता है कि क्या नई पारी में बीजेपी लीडरशिप की अपने सहयोगियों पर पकड़ ढीली पड़ी है? क्या जो उदारता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में दिखाई थी अब वो ऐसा करने के मूड में नहीं है? सवाल ये भी है कि महारष्ट्र में अगर शिवसेना के साथ एनसीपी-कांग्रेस की सरकार बन भी गई तो क्या वो पांच साल चलेगी? या राष्ट्रपति शासन के दौरान हमें जोड़-तोड़ का नया खेल देखने को मिलेगा?


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