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आवाज अड्डा: कार बाजार पर छाया मंदी का साया, सुस्त चाल के लिए कौन है जिम्मेदार!

ऑटो कंपनियां इसे भयानक मंदी बता रही हैं। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ऑटो सेक्टर में धीमेपन के पीछे कुछ और ही कारण बता रही हैं।
अपडेटेड Sep 12, 2019 पर 12:16  |  स्रोत : Moneycontrol.com

ऑटो इंडस्ट्री की बुरी हालत के लिए क्या ओला उबर जिम्मेदार हैं, क्या नए जामाने के बच्चे कार खरीदने में शान नहीं समझते हैं, क्या ऑटो इंडस्ट्री ऐसे दौर से गुजर रही है जहां उसे खेल के नए नियम सीखने होंगे, वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन का मानना है कि ओला उबर की कहानी में दम है, हालांकि वो इंडस्ट्री की मदद करेंगी लेकिन इंडस्ट्री को भी सच का समाना करना होगा, इसके अलावा इलेक्ट्रिक वेहिकल की चुनौती भी सामने खड़ी है, दुनियाभर की कार कंपनियों के सामने ये सबसे बड़ी चैलेंज है।


आजकल कार और बाइक शोरूम का हाल कुछ ऐसा है। फेस्टिव सीजन चल रहा है, शोरूम में चमचमाती गाड़ियां खड़ी हुई हैं, लेकिन ग्राहक गायब हैं। कार शोरूम हाल ही में वीरान नहीं हुए हैं। पिछले कुछ महीनों से कार और बाइकों की बिक्री पर ब्रेक लगा हुआ है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अगस्त में कार बिक्री 22 साल के सबसे कम स्तर पर पहुंच गई है। ऑटो कंपनियां इसे भयानक मंदी बता रही हैं। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ऑटो सेक्टर में धीमेपन के पीछे कुछ और ही कारण बता रही हैं।


ऑटो सेक्टर की मंदी पर इंडस्ट्री की राय बंटी हुई है। मारुति के चेयरमैन आर सी भार्गव का मानना है कि एंट्री लेवल कारें लोगों के बजट से बाहर हो गई हैं। वो इसके लिए नए सेफ्टी फीचर्स, ज्यादा टैक्स, महंगा पेट्रोल-डीजल, बढ़ी हुई रजिस्ट्रेशन फीस और इंश्योरेंस प्रीमियम को जिम्मेदार मानते हैं।


लेकिन बजाज ऑटो के एमडी राजीव बजाज तो मंदी के लिए ऑटो कंपनियों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि ऑटो कंपनियों को अपनी कमियों की तरफ देखना चाहिए। भारत में बनने वाली गाड़ियों की क्वालिटी औसत दर्जे की है। एक ही कंपनी स्कूटर, बाइक, कार और SUV से लेकर ट्रक, बस तक बनाएगी तो क्वालिटी विश्व स्तर की नहीं होगी।


कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक ने भी ऑटो कंपनियों को ग्राहकों की पसंद के हिसाब से खुद को बदलने की सलाह दी है। वो इसके पीछे अपना ही उदाहरण दे रहे हैं।


ऐसे में सवाल ये है कि ऑटो सेक्टर में स्लोडाउन के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या वजह है कि हर बार मुश्किल में फंसने के साथ ही वो सरकार से गुहार लगाते नजर आते हैं। कभी BS स्टैंडर्ड की डेडलाइन बढ़ाने के लिए तो कभी GST घटाने के लिए। लेकिन क्या इस इंडस्ट्री के लीडर अपने कस्टमर के मिजाज के साथ-साथ दुनिया भर में बदलते ट्रेंड को नहीं समझ पा रहे हैं। क्या सब कुछ ऑटो मोड पर चल रहा है।