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दागी नेताओं पर सुप्रीम फैसला, साझा करना होगा उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड

राजनीति में आपराधिक मामले वाले नेताओं पर लगाम कसने के लिए काफी समय से कोशिशें चल रही थीं।
अपडेटेड Feb 14, 2020 पर 13:22  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

राजनीति में आपराधिक मामले वाले नेताओं पर लगाम कसने के लिए काफी समय से कोशिशें चल रही थीं। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बड़ा फैसला सुना दिया है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक सभी पार्टियों को अपने उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड जनता के साथ साझा करना होगा। उसे अपनी वेबसाइट के अलावा फेसबुक और ट्विटर पर भी डालना होगा। लगभग हर पार्टी में आपराधिक मामले वाले सांसदों और विधायकोंकी मौजूदगी है। कुछ पार्टियों इनकी संख्या काफी ज्यादा है। तो क्या अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीति में स्वच्छता अभियान चलेगा। कैसे लगेगी आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं पर लगाम।


चुनाव में दागी नेताओं को टिकट देने को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियों को उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड जनता के साथ साझा करना होगा। उनका आपराधिक रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट के अलावा फेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर भी डालना होगा। इतना ही नहीं, पार्टियों को इस बारे में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में भी ब्योरा देना होगा। पार्टियों को ये भी बताना होगा कि वो साफ छवि वाले नेता के बजाए दागी नेता को क्यों टिकट दे रही हैं। दागी नेता को टिकट देने के 72 घंटे के भीतर चुनाव आयोग को भी रिपोर्ट देनी होगी। कोर्ट ने जिताऊ उम्मीदवार के तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया।


चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया था कि पिछले चार लोकसभा चुनावों में आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसदों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2004 में 24% दागी सांसद संसद में पहुंचे थे जिनकी संख्या 2019 में बढ़कर 43% हो गई है। मौजूदा लोकसभा में सबसे ज्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद बीजेपी के हैं। हालांकि बीजेपी कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रही है। उसका कहना है कि इससे चुनाव में पारदर्शिता बढ़ेगी।


दागी सांसद और विधायक दूसरी पार्टियों में भी कम नहीं हैं। कांग्रेस ने अपने दागी नेताओं पर चुप्पी साध ली है। लेकिन बीजेपी में दागी सांसदों को लेकर हमला कर रही है। राजनीतिक पार्टियों की एक दलील ये भी है कि जब तक किसी नेता पर आरोप सिद्ध नहीं हो जाते उसे दोषी नहीं माना जा सकता। RJD और NCP का कहना है कि किसे अपराध माना जाए और किसे नहीं, इस पर भी चर्चा की जरूरत है।
 
CPM इसमें चुनाव आयोग की बड़ी भूमिका देख रही है। चुनाव आयोग समय-समय पर चुनाव सुधार के दिशा में कदम उठाता रहा है। इसी साल जनवरी में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं को टिकट नहीं देने का सुझाव दिया था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा ही सुझाव दिया था जिसका केंद्र सरकार ने विरोध किया था। चुनाव आयोग की भूमिका दिशा निर्देश देने तक है। लेकिन राजनीति में दागी नेताओं की एंट्री बंद करने के लिए कानून तो सरकार ही बनाएगी।


ऐसे में सवाल ये है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कोई असर दिखेगा? क्या राजनीतिक दल जिताऊ उम्मीदवार के नाम पर अपराधियों को टिकट देते रहेंगे? क्या गंभीर और छोटे-मोटे अपराधों के बीच फर्क होना चाहिए? अगर हां तो फिर इसे परिभाषित करने की जिम्मेदारी किसकी है? या फिर चुनाव में दंबगई और पैसे का कॉकटेल इतना असरदार है कि इसे कोई पार्टी छोड़ना नहीं चाहती?  आवाज़ अड्डा में इसी पर हो रही है बड़ी चर्चा।


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