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आवाज अड्डाः आरक्षण-गोलमाल या कमाल, क्या बड़ी बहस की है जरूरत?

क्या आरक्षण पर खुलकर बहस होनी चाहिए। ये सवाल फिर उठाया है आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने।
अपडेटेड Aug 20, 2019 पर 11:13  |  स्रोत : CNBC-Awaaz

क्या आरक्षण पर खुलकर बहस होनी चाहिए। ये सवाल फिर उठाया है आरएसएस के सरसंघ चालक  मोहन भागवत ने। पिछली बार उन्होंने आरक्षण का मुद्दा 2015 में उठाया था। बिहार चुनाव के ठीक पहले। तब इसपर भारी विवाद हुआ था। शायद इसीलिए इस बार भागवत काफी सधी हुई जुबान में ऐसी बात कर रहे हैं जो सुनने में तार्किक भी लगती है और सद्भावना से भरी भी। बीजेपी सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण की शुरुआत कर भी चुकी है और भागवत ये भी कह रहे हैं कि सरकार और बीजेपी उनकी बात से सहमत हों ये जरूरी नहीं। लेकिन तब सवाल उठता है कि फिर वो आरक्षण की नई बहस किसके लिए और किसके साथ चाहते हैं। और राजनीति का सवाल ये है कि इस वक्त ये मुद्दा उठने से बीजेपी को फायदा होगा या नुकसान।


देश में आरक्षण की नीति को लेकर सियासी मौसम बिगड़ने लगा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की नीति पर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि आरक्षण के पक्ष में और इसके खिलाफ लोगों के बीच सद्भावपूर्ण माहौल में बातचीत होनी चाहिए।  उन्होंने कहा कि आरक्षण पर चर्चा तीखी हो जाती है जबकि इस पर समाज के विभिन्न वर्गों में सामंजस्य जरूरी है। भागवत ने कहा कि आरएसएस, बीजेपी और सरकार तीन अलग-अलग इकाइयां हैं। बीजेपी और सरकार में संघ के कार्यकर्ता हैं। लेकिन वो आरएसएस से सहमत हों, ऐसा जरूरी नहीं है। पार्टी के सत्ता में आने के बाद उसके लिए सरकार और राष्ट्रीय हित प्राथमिकता हो जाते हैं।


मोहन भागवत एहतियात बरत रहे हैं क्योंकि आरक्षण पर बिहार चुनाव से पहले उनके बयान ने विपक्ष को मुद्दा दे दिया था। और इस बार भी विपक्ष ने हमले में कोई देरी नहीं की।


बीएसरी प्रमुख मायावती ने ट्वीट करके कहा कि आरएसएस का एससी, एसटी, ओबीसी आरक्षण के संबंध में ये कहना कि इस पर खुले दिल से बहस होनी चाहिए, संदेह की घातक स्थिति पैदा करता है जिसकी कोई जरूरत नहीं है। आरक्षण मानवतावादी संवैधानिक व्यवस्था है जिससे छेड़छाड़ अनुचित और अन्याय है।


लेकिन क्या मोहन भागवत के बयान को इतने संदेह से देखा जाना चाहिए। क्या वो सचमुच आरएसएस, बीजेपी के एजेंडे के तहत बहस की बात कर रहे हैं। या फिर क्या सचमुच आरक्षण पर एक बार बातचीत करने की जरूरत है? क्या रिजर्वेशन के अब तक के फायदे पर कोई स्टेटस रिपोर्ट नहीं लाई जानी चाहिए? क्या अब सामाजिक पिछड़ेपन बनाम आर्थिक रिजर्वेशन पर बातचीत की गुंजाइश बनती है? या ये ऐसा राजनीतिक सामाजिक मुद्दा है जिससे ज्यादातर पार्टियों का नफा नुकसान जुड़ा है?


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