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मोदी सरकार में कैसे बदली हाउसिंग सेक्टर में टैक्सेशन की तस्वीर

2014 में सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार का फोकस मध्य और कम आमदनी वाले हाउसिंग सेगमेंट पर रहा है। सरकार ने इस दौरान लोगों को राहत देने के लिए हाउसिंग ट्रांजैक्शंस पर कई तरह के टैक्स बेनेफिट्स भी दिए हैं
अपडेटेड Jan 25, 2021 पर 10:54  |  स्रोत : Moneycontrol.com

अश्विनी कुमार शर्मा


केंद्र में आने वाली सरकारें लगातार रेजिडेंशियल हाउसिंग को बढ़ावा देती रही हैं। इसी कड़ी में मई 2014 में आई नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी इस सेक्टर पर अपना फोकस बनाए रखा है। लोगों को घर खरीदने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई तरह के टैक्स इनसेंटिव्स भी दिए हैं। इसके अलावा, मोदी सरकार का “2022 तक सबको घर” देने के विजन से भी सस्ते घरों के सेगमेंट में उत्साह का माहौल देखने को मिला है।


मोटे तौर पर, टैक्स इनसेंटिव्स और अपने खुद के घर या किराए पर रहने वाले हम लोगों के लिए लिए नियमों में हुए बदलावों को तीन मदों में बांटा जा सकता है।


होम लोन लीजिए, टैक्स बेनेफिट पाइए


जब हम अपना होम लोन चुकाना शुरू करते हैं तो शुरुआती वर्षों में आमतौर पर ब्याज का हिस्सा ज्यादा होता है। नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) के जून 2014 में पेश किए गए पहले बजट में होम लोन लेने वाले लोगों को राहत दी गई थी।


स्वर्गीय अरुण जेटली उस वक्त वित्त मंत्री थे। उन्होंने सेक्शन 24 के तहत सेल्फ ऑक्युपाइड हाउस प्रॉपर्टी (यानी ऐसे घर जिसमें आप रह रहे हों) के लिए होम लोन पर ब्याज पर डिडक्शन को पहले के 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दिया था।


आपके लिए गए होम लोन पर आपकी चुकाई जाने वाली मासिक किस्त (ईएमआई) के मूलधन वाले हिस्से पर सेक्शन 80सी के तहत आपको 1.5 लाख रुपये तक टैक्स डिडक्शन का फायदा मिलता है।


मध्यम और कम आमदनी वाले तबके के लिए घर खरीदने को सुविधाजनक बनाने के लिए सरकार ने 2016 के बजट में एक नया सेक्शन 80ईईई पेश किया।


इसके तहत अगर आप पहली बार कोई घर खरीद रहे हैं और इसके लिए लोन लेते हैं तो आप होम लोन पर चुकाए जाने वाले ब्याज पर टैक्स में हर साल 50,000 रुपए की अतिरिक्त छूट हासिल कर सकते हैं।


हालांकि, इसमें शर्त यह थी कि आपका होम लोन 35 लाख रुपये तक का होना चाहिए और यह फाइनेंशियल ईयर 2016-17 में पारित हुआ हुआ हो। साथ ही ऐसे घर की कीमत भी 50 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।


यह डिडक्शन सेक्शन 24 के तहत चुकाए जाने वाले ब्याज पर मिलने वाले 2 लाख रुपये की छूट से अलग है।


2019 के बजट में सरकार ने सेक्शन 80ईईए के तहत एक अतिरिक्त डिडक्शन पेश किया। यह डिडक्शन भी पहली बार घर ले रहे खरीदारों के लिए था। इसमें 45 लाख रुपये तक के घर को खरीदने पर चुकाए जाने वाले ब्याज में 1.5 लाख रुपये तक की अतिरिक्त छूट का प्रावधान किया गया था।


इसमें शर्त यह थी कि होम लोन 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 के बीच लिया गया होना चाहिए। चूंकि यह डिडक्शन केवल पहली बार घर खरीद रहे बायर्स के लिए ही है, ऐसे में आप सेक्शन 80ईई के तहत मिलने वाले टैक्स डिडक्शन का फायदा नहीं उठा सकते हैं।


इस तरह से हाउसिंग लोन पर चुकाए जाने वाले ब्याज पर मिलने वाला कुल डिडक्शन 3.5 लाख रुपये (2 लाख रुपये सेक्शन 24 के तहत और 1.5 लाख रुपये नए सेक्शन 80ईईए के तहत) कर दिया गया है।


हालांकि, अगर आप रेंट पर रहते हैं तो आप अपने एंप्लॉयर के दिए जाने वाले हाउस रेंटल अलाउंस (एचआरए) बेनेफिट्स को क्लेम कर सकते हैं। अगर आपका दफ्तर आपको एचआरए बेनेफिट्स नहीं देता है तो 2016 के बजट में सेक्शन 80जीजी के तहत डिडक्शन को पहले के 24,000 रुपये सालाना से बढ़ाकर 60,000 रुपये कर दिया गया। इसके जरिए ऐसे लोगों को राहत दी गई जो किराए के घर पर रहते हैं लेकिन उन्हें एचआरए का फायदा नहीं मिलता है।


हाउसिंग प्रॉपर्टी की बिक्री


मुनाफे पर किसी हाउसिंग प्रॉपर्टी को बेचने पर कैपिटल गेन्स टैक्स का मामला बनता है।


2017 के बजट में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स क्लेम करने की ऊपरी सीमा को घटाकर 2 साल कर दिया गया जो कि पहले तीन साल थी।


हाउस प्रॉपर्टी बेचने पर लगने वाला लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (एलटीसीजी) टैक्स 20 फीसदी है।


टैक्स के इस बोझ को और घटाने के मकसद से 2017 के बजट में एलटीसीजी को कैलकुलेट करने के बेस ईयर को 1981 से बदलकर 2001 कर दिया गया।


इस बदलाव से प्रॉपर्टी बेचने वाले लोगों को ज्यादा बेहतर इंडेक्सेशन बेनेफिट मिलने लगा। ज्यादा इंडेक्सेशन से कॉस्ट प्राइस में महंगाई को ध्यान में रखते हुए इजाफा होता है।


इससे कम से कम कागजों में तो होने वाले मुनाफे में कमी आती है और आप पर लगने वाले टैक्स का बोझ भी घटता है।


लेकिन, अगर आप घर की बिक्री से मिलने वाले पैसों को दोबारा निवेश करते हैं तो इसमें भी इनकम टैक्स नियमों के हिसाब से आपको एलटीसीजी टैक्स में राहत दी जाती है। लेकिन, गुजरे वर्षों में इन नियमों को सख्त किया गया है।


2014 तक संपत्ति के ट्रांसफर पर होने वाले कैपिटल गेन्स को अगर आप एक निश्चित समयावधि में रेजिडेंशियल घर खरीदने में लगाते हैं तो सेक्शन 54 और सेक्शन 54एफ के तहत ऐसी स्थितियों में इस पैसे पर टैक्स से छूट मिलती है।


एक नई प्रॉपर्टी को दो साल के भीतर खरीदा जाना चाहिए या तीन साल के भीतर नया घर बना लिया जाना चाहिए। इस नियम में खरीदी जाने वाली प्रॉपर्टीज की कोई सीमा तय नहीं की गई है।


2014 के बजट में रीइनवेस्टमेंट के लिए मिलने वाली छूट को केवल एक रेजिडेंशयल घर तक सीमित रखा गया था। साथ ही अगर आप घर की बिक्री से मिलने वाली रकम को तयशुदा बॉन्ड्स (सेक्शन 54ईसी के तहत) को छोड़कर कहीं और निवेश करना चाहते हैं तो निवेश करने वाली रकम पर मिलने वाली राहत को अधिकतम 50 लाख रुपये तक सीमित कर दिया गया था।


2020 बजट में 2 करोड़ रुपये तक के कैपिटल गेन्स पाने वाले टैक्सपेयर के लिए दो रेजिड़ेंशियल घरों में रीइनवेस्टमेंट को इजाजत दी गई है।


दूसरी ओर, 2017 के बजट में किसी हाउस प्रॉपर्टी में होने वाले अधिकतम लॉस इसे आय के दूसरे जरियों से सेट ऑफ करने को सीमित कर दिया गया था।


तब से ही प्रॉपर्टी के मालिक को “हाउस प्रॉपर्टी से हुई कमाई” मद के तहत होने वाली आय से केवल 2 लाख रुपये तक के लॉस को सेट ऑफ करने की इजाजत दी गई थी।


इससे पहले ऐसी कोई सीमा नहीं थी। हालांकि, जहां पर लॉस अमाउंट 2 लाख रुपये से ज्यादा है, वहां इसे अगले 8 साल तक सेट ऑफ के लिए कैरी फॉरवर्ड किया जा सकता है।


2018 के बजट में ऐसे घर खरीदने और बेचने वालों को राहत दी गई थी जो ऐसी लोकेशंस पर प्रॉपर्टीज की खरीद या बिक्री करना चाहते हैं जहां सर्किल रेट मार्केट वैल्यू से ज्यादा है।


अगर प्रॉपर्टी की वास्तविक बिक्री की कीमत और इसके सर्किल रेट के बीच अंतर 5 फीसदी से कम है तो अब ऐसे सेलर्स और बायर्स पर कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं लगेगा।


आमतौर पर रजिस्ट्रेशन वैल्यू पर अतिरिक्त स्टैंप ड्यूटी चुकानी होती है क्योंकि यह सर्किल रेट से कम नहीं हो सकती है।


साथ ही मार्केट रेट और सर्किल रेट के बीच के अंतर पर इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 56(2) के तहत टैक्स भी लगता है क्योंकि इसे बायर के प्रॉफिट के तौर पर देखा जाता है।


बेचने वाले के लिए कैपिटल गेन्स और टैक्स लाइबिलिटी बढ़ जाती है क्योंकि कैपिटल गेन्स का आकलन सेक्शन 50सी के तहत प्रॉपर्टी की स्टैंप वैल्यू के आधार पर किया जाता है, भले ही बिक्री की कीमत सर्किल रेट से कम क्यों न हो।


कोविड-19 राहत पैकेज के तौर पर हाल में ही यह सीमा बढ़ाकर 20 फीसदी कर दी गई है ताकि रियल एस्टेट ट्रांजैक्शंस में होने वाली दिक्कतों को कम किया जा सके।


सस्ते घर


कम आमदनी वाले लोगों को घर खरीदने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने इसे इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया है। यह फैसला 2017 के बजट में किया गया था।


इससे कम कीमत वाले घर बनाने वाले बिल्डरों को स्पेशल टैक्स बेनेफिट्स मिलने का रास्ता साफ हो गया है।


यह देखना बाकी है कि क्या 2021 के बजट में सरकार हाउसिंग सेक्टर पर अपना फोकस इसी तरह जारी रखती है जैसा कि पिछले वर्षों के दौरान देखा गया है, या फिर सरकार कोई नया रास्ता अख्तियार करती है।


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