Moneycontrol » समाचार » प्रॉपर्टी

Loksabha Polls 2019: चुनावों के दौरान प्रॉपर्टी खरीदना ठीक रहेगा?

प्रकाशित Fri, 26, 2019 पर 13:11  |  स्रोत : Moneycontrol.com

अभी 2019 के आम चुनावों का दौर जारी है तो ऐसे में होमबॉयर्स और प्रायवेट इक्विटी के इन्वेस्टर क्या करें? क्या उन्हें कोई भी कदम उठाने से पहले चुनाव के नतीजों का इंतजार कर लेना चाहिए? क्या प्रॉपर्टी की कीमतें चुनावों के बाद अचानक ऊंची चढ़ेंगी या उनमें और कमी आएगी? ऐसे कुछ सवाल बॉयर्स और इन्वेस्टर्स दोनों के ही मन में चल रहे हैं।


बहरहाल एक बात बिल्कुल साफ है- चुनावी मौसम में भी होमबॉयर्स जोर-शोर से रेडी-टू-मूव इन प्रॉपर्टीज की तलाश में हैं और इस सिलसिले में उनकी कोशिश सौदे को ठोस शक्ल देने की है, बशर्ते जो प्रॉपर्टी खरीदी जा रही है वह एकदम तैयार हालात में हो- कुछ ऐसा कि उसे देखा-परखा जा सके, खूब मोल-भाव किया जा सके।


जहां तक प्रॉपर्टीज की कीमतों का सवाल है, एक्सपर्ट्स का कहना है उसमें लगभग 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है और अब कीमतें धीमे-धीमे आगे ही बढ़ेंगी।


विशेषज्ञों का कहना है कि प्रॉपर्टीज की घटी हुई कीमत, इंटरेस्ट रेट का कम होना और खरीदारों में आत्मविश्वास की वापसी के कारण अब रिकवरी का सही माहौल तैयार हुआ है- यहां तक कि बाजार जोर पकड़ सकता है। अगर नई सरकार सूद की दर कम रखने और रोजगार दर को बढ़ाने में कामयाब रही तो फिर रियल एस्टेट में निवेशकों के पक्ष में कहीं ज्यादा संतुलित माहौल तैयार हो सकेगा।


रियल एस्टेट सेक्टर को 2014 के चुनावों तक प्रभावित करने वाली मुख्य बात रही राजनीतिक अनिश्चितता, अनबिकी इन्वेंट्री, उपलब्ध प्रॉपर्टीज की प्रति माह बिक्री और सूद की दर- साथ ही, उस वक्त आरईआइटी और रियल एस्टेट, रेग्युलेशन एंड डेवलपमेंट बिल का शक्ल अख्तियार करना बाकी था।


नकदी और नियमन के सिलसिले में किए गए डिसरप्टिव रिफॉर्म्स का मसला रियल एस्टेट सेक्टर को 2019 में प्रभावित कर रहा है। ये सेक्टर कर्ज फराहम करने के मामले में परंपरागत रूप से बैंकिंग प्रणाली पर निर्भर रहा है और बैकिंग सेक्टर पर दबाव होने के कारण रियल एस्टेट सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है।


आइसीआरए के विश्लेषण के मुताबिक, धन मुहैया करने के मामले में जो कमी-बेशी हुआ करती थी उसे एनबीएफसी और एचएफसी पूरा करते थे लेकिन नकदी की कमी के कारण इस मोर्चे पर भी यही नजर आ रहा है कि वित्त वर्ष 2019 की तीसरी तिमाही से एनबीएफसी नकदी की कमी के कारण कम मात्रा में कर्ज मुहैया करा पा रहा है। नतीजतन, फंडिंग की लागत 50-200 बेसिस प्वाइंट बढ़ गई है और लागत का बढ़ना बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि बॉरोअर की प्रोफाइल क्या है। कुछ मामलों में यह भी हुआ कि नए लोन की मंजूरी की तारीख आगे के वक्त के लिए खिसका दी गई या फिर ऐसे लोन की मंजूरी में देरी हुई। होम लोन का वितरण भी प्रभावित हुआ। इन बातों के कारण मुख्य रूप से छोटे डेवलपर्स पर चोट पड़ी। रियल एस्टेट के क्षेत्र में बड़े डेवलपर्स लोन जुटाने के मामले में कहीं ज्यादा सक्षम साबित हुए।


एनारॉक के आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 में शीर्ष के सात शहरों में रियल एस्टेट क्षेत्र की सर्वाधिक परियोजना की शुरुआत हुई और बिक्री भी अच्छी रही। 2014 में तकरीबन 5.45 इकाइयों की शुरुआत हुई और लगभग 3.43 लाख इकाइयों की बिक्री हुई। 2014 में कम परियोजनाओं, लगभग 4.6 लाख इकाइयों की शुरुआत हुई थी और बिक्री भी कम रही थी।


साल 2014 में एक पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। माहौल आशा भरा था। बदले हुए माहौल का असर रियल एस्टेट पर पड़ा- नई परियोजनाओं की शुरुआत में तेजी आई। लेकिन इसके बाद क्षेत्र के नियमन से जुड़े सुधारों का एक सिलसिला चला- आरइआरए, जीएसटी और आरईआइटी वजूद में आए- साथ ही नोटबंदी भी हुई। ऐसे में रियल एस्टेट के क्षेत्र में नई इकाइयों का निर्माण और बिक्री साल-दर-साल घटती गई।


एनारॉक प्रापर्टी कंसल्टेंट के चेयरमैन अनुज पुरी का कहना है कि मौजूदा सरकार ने जिस भी नई नीति की घोषणा की वह रियल एस्टेट के क्षेत्र में बाधा पैदा करने का सबब बना और यह सेक्टर जारी असमंजस के भाव से कभी उबर नहीं पाया। बेशक केंद्र में एक मजबूत सरकार थी और उसने सुधार के जो कदम उठाए थे इसका असर दूरगामी तौर पर रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बेहतर होने वाला था लेकिन तात्कालिक तौर पर सुधार के इन उपायों ने रियल एस्टेट सेक्टर को चोट पहुंचाई। सुधार के जो उपाय किए गए हैं उनका आगे के वक्त में होने वाला फायदा तभी हासिल हो सकता है जब मौजूदा या फिर बनने जा रही नई सरकार उपायों को लगातार लागू किए रहे।


नियमन के उपायों के कारण बाधा तो पैदा हुई है लेकिन इसके बावजूद मार्केट बढ़वार पर है। कंज्यूमर सौदा करने का फैसला लेते वक्त अब यह नहीं सोच रहा कि जरा ठहरकर सोच लें कि आखिर जीत किसकी होनी है जबकि पहले ऐसी सोच रहती थी। अब सौदे के फैसला मौजूदा आर्थिक माहौल के हिसाब से हो रहा है। लायसेज फोराज के पंकज कपूर का कहना है कि अगर आप मकान ढूंढ़ रहे हैं और आपको रेडी-टू-मूव इन हालत में मौजूद मकान अपने बजट के अनुकूल नजर आता है तो फिर रुकिए मत, खरीदारी के पेपर पर अपना नाम भरकर सौदे को झटपट निपटा लीजिए।


पंकज कपूर कहते हैं कि खरीदारों को ये बात याद रखनी चाहिए कि इस वक्त बिल्डर्स का भी ध्यान अपने अनबिके स्टॉक को बेचकर नकदी बढ़ाने पर है और बायर्स इस स्थिति में खूब मोल-तोल करके अपने हिसाब से बेहतर कीमत पर मकान खरीद सकते हैं।


रियल एस्टेट-कितने मकान बिके


पंकज कपूर बताते हैं कि साल 2009 से 2014 के बीच कुल 10 लाख इकाइयों की बिक्री हुई और  2014 से 2019 के बीच 12 लाख यूनिट्स बिकी हैं। इसका मतलब हुआ कि कुल बिक्री में 20 फीसद का सुधार हुआ है। अभी इन्वेंट्री मकानों की तादाद 9.45 लाख यूनिट्स है और नए यूनिटस् के निर्माण में 87 फीसद का इजाफा हुआ है।


पंकज कपूर का कहना है कि भारत के शहरी इलाके में आवास की कमी की समस्या के समाधान के लिए हमें 1.8 करोड़ मकानों की जरूरत होगी। लेकिन अभी हमारे पास देश के आठ बड़े शहरों के लिहाज से देखें तो तैयार हालत में सिर्फ 9.45 लाख मकान ही मौजूद हैं। अगर टियर-टू के शहरों को शामिल कर लें तब भी तैयार मकानों की संख्या 14 लाख तक ही पहुंच रही है। यह आंकड़ा 1.8 करोड़ मकानों की जरूरत के सामने कहीं नहीं नहीं ठहरता। हरेक को आवास उपलब्ध कराने के मकसद को पूरा करने के लिए इन्वेंट्री में 10 गुना इजाफा करना होगा। चिंता की एक बात अभी मकानों की बिक्री की है लेकिन इसमें सुधार हो रहा है- मकानों की बिक्री में 10 प्रतिशत का इजाफा हुआ है लेकिन इन्वेंट्री को बनाए रखने के लिए मकानों की बिक्री में 250 प्रतिशत का इजाफा होना चाहिए।


बाजार में रियल एस्टेट की दो तरह की परियोजनाओं में खरीद हो रही है- एक तो रेडी-टू-मूव इन प्रॉपर्टी और दूसरी कमर्शियल प्रॉपर्टीज जो कारपोरेट ब्रांडेड डेवलपर्स की हैं।


संस्थागत निवेशकों का समुदाय चुनाव के नतीजों पर नजर टिकाए हुए है। जेनरीयल एडवर्टाइजर्स के चेयरमैन अंकुर श्रीवास्तव का कहना है कि नए सिरे से फंडिंग उपलब्ध होने वाली है, यह फंडिंग एनबीएफसी में संकट पैदा होने के बाद रुक गई थी।


स्थानीय स्तर पर होने वाली रियल एस्टेट की खरीदारी पर चुनावों का असर पड़ा है। चढ़ती के समय ऊंची कीमत पर बेचकर लाभ कमाने की मंशा में मकान की खरीदारी करने वाले मध्यवर्ती निवेशक अभी बाजार में दिखाई नहीं दे रहे। अभी मकान की खरीदारी पर जोर उन्हीं का है जो खुद मकान में रहना चाहते हैं यानी एंड-यूजर्स का और ऐसे खरीदार बेहतर सौदे की तलाश में है- ये खरीदार रेरा के तहज पंजीकरण करा चुके डेवलपर्स से मकान खरीद रहे हैं जिनका रिकार्ड नियत समय पर मकान उपलब्ध कराने का रहा है।


अंकुर श्रीवास्तव के मुताबिक छोटे निवेशकों को आरइआईटी में निवेश करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि कमर्शियल रेन्ट्स को अभी और आगे बढ़ना है।


एनरॉक रिसर्च के आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में कमर्शियल रियल एस्टेट सप्लाई को गति मिलेगी क्योंकि प्राइवेट इक्विटी के दिग्गजों ने इस क्षेत्र (रियल एस्टेट) में रुचि दिखाई है और वे कमर्शियल रियल एस्टेट में अभी खूब धन डाल रहे हैं। कमर्शियल सेगमेंट में कुल प्राइवेट इक्विटी का प्रवाह साल 2018 में 2.8 बिलियन डॉलर का रहा और यह साल 2017 के 2.20 बिलियन डॉलर से ज्यादा है। बीते कुछ सालों के प्राइवेट इक्विटी के रुझानों के विश्लेषण से पता चलता है कि साल 2015 से 2018 के बीच रियल एस्टेट के कमर्शियल सेगमेंट में प्राइवेट इक्विटी का प्रवाह 7.4 बिलियन डॉलर रहा है। इस अवधि में रेजिडेंशियल सेगमेंट में प्राइवेट इक्विटी का प्रवाह मात्र 2.9 बिलियन डॉलर रहा। इस साफ पता चलता है कि वैश्विक और घरेलू दोनों ही दायरों के प्राइवेट इक्विटी प्लेयर्स कमर्शियल सेगमेंट में खूब रुचि ले रहे हैं।


बढ़ती उम्मीदें


नई सरकार की कोशिश नियमन के ज्यादातर उपाय लागू करने की होनी चाहिए ताकि उससे पता चले कि भारत में रियल एस्टेट का मार्केट अब परिपक्वता की हालत में पहुंच चुका है। सरकार को नियमन के ऐसे उपाय करने होंगे जिनमें दंड देने की शक्ति निहित हो और सिंगल विंडो मैकेनिज्म के बाबत भी सोचना होगा।


फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स के अध्यक्ष और भारत सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की केंद्रीय सलाहकार समिति के सदस्य अभय उपाध्याय का कहना है केंद्र में जो भी सरकार सत्ता संभाले उसे होमबॉयर्स के भीतर विश्वास जगाने के उपाय करने होंगे, खरीदारों का भरोसा बढ़ाना होगा और नियमनकारी उपायों को मजबूत करना पड़ेगा।


अभय उपाध्याय का कहना है कि रेरा का नियम लागू हो चुका है लेकिन इसके बावजूद होमबॉयर्स रेरा के तहत पंजीकृत परियोजनाओं में मकान की खरीदारी में हिचकिचाहट दिखा रहे हैं क्योंकि रेरा के नियमों का सख्ती से पालन नहीं हो रहा। इस कानून को समुचित तरीके से लागू किया जाना चाहिए और नियमों के पालन में ढिलाई को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। मार्केट में प्रतिस्पर्धा बढ़नी चाहिए- इससे प्रापर्टी की कीमतों को युक्तिसंगत बनाने में मदद मिलेगी।


डेवलपर्स को उम्मीद है कि जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वो रियल एस्टेट के क्षेत्र को ज्यादा गतिशील बनाने की दिशा में प्रयास करेगी क्योंकि इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार का सृजन होता है। ट्यूलिप इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड के सीएमडी प्रवीण जैन का कहना है कि सिंगल विंडो मैकेनिज्म लागू होना चाहिए ताकि सारे अप्रूवल्स समय रहते हासिल हो जाएं। अधिकारियों को और ज्यादा जवाबदेही दिखानी होगी ताकि अप्रूवल में देरी ना हो। अगर संभव हो तो अधिकारियों को भी रेरा कानून के दायरे में लाया जाए।


कुछ डेवलपर्स को यह भी आशा है कि अपेक्षाकृत कम बजट वाले हाउसिंग सेगमेंट में सरकारी सहायता जैसे केंद्र और राज्य के स्तर पर चलने वाली विभिन्न योजनाओं तथा टैक्स-छूट और इंफ्रास्ट्रक्चर स्टेट्स का दर्जा मुहैया कराने सरीखे कदमों के कारण उछाल आएगी।