Moneycontrol » समाचार » रिटायरमेंट

अगर रेगुलर इक्विटी म्यूचुअल फंड को मैनेज न कर पा रहे हों तभी इसमें लगाएं पैसा

ओपन एंडेड फंड्स में पैसा लगाना आपको रीबैलेंसिंग करने में मदद देता है, जबकि रिटायरमेंट फंड्स में ऐसा नहीं किया जा सकता है।
अपडेटेड Dec 16, 2019 पर 09:10  |  स्रोत : Moneycontrol.com

ओपन एंडेड फंड्स में पैसा लगाना आपको रीबैलेंसिंग करने में मदद देता है, जबकि रिटायरमेंट फंड्स में ऐसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनमें एक लॉक-इन पीरियड होता है। हम में से ज्यादातर लोगों के दिमाग में अक्सर यह सवाल आता है कि अपनी उम्र के 70वें या 80वें दशक में पहुंचकर भी कैसे वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर रहा जा सकता है? यानी की रिटायर होने के तकरीबन दो दशक बाद भी अपनी जरूरतें बिना किसी और पर निर्भर रहे कैसे पूरी की जा सकती हैं। 25 लाख करोड़ रुपये वाली म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में आपको शायद इस सवाल का जवाब मिल सकता है।


हाल के सालों में कई फंड हाउसेज ने ऐसी स्कीमें लॉन्च की हैं जो कि खासतौर पर रिटायरमेंट सेविंग्स को टारगेट करती हैं।वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीयों की जीवन प्रत्याशा या औसत उम्र 2017 में बढ़कर 68।56 साल हो गई है जो कि 1960 में महज 41।17 साल थी। अगर यह ट्रेंड जारी रहता है तो मौजूदा दौर के भारतीयों के पिछली पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा वक्त तक जीवित रहने के आसार हैं।पिछले हफ्ते, एक्सिस रिटायरमेंट सेविंग्स फंड लॉन्च हुआ। यह स्कीम इनवेस्टर्स को तीन प्लान ऑफर कर रही है- एग्रेसिव (इक्विटीज में 65 फीसदी तक इनवेस्टमेंट), डायनेमिक (इक्विटीज में 100 पर्सेंट तक निवेश) और कंजर्वेटिव (इक्विटिज में 40 पर्सेंट तक इनवेस्टमेंट)। यह फंड 13 दिसंबर को बंद हो रहा है। जाहिर सी बात है कि कई और फंड हाउस भी इस तरह की रिटायरमेंट स्कीमें सालों से ऑफर कर रहे हैं।


आपको भी रिटायरमेंट फंड्स में पैसा लगाना चाहिए? क्या ये इक्विटी फंड्स के मुकाबले बेहतर साबित होते हैं जो खुद भी लंबे वक्त की सेविंग्स के लिहाज से बने होते हैं? रिटायरमेंट म्यूचुअल फंड्सफाइनेंशियल प्लानर्स अक्सर रिटायरमेंट के लिए अक्सर इक्विटी फंड्स में पैसा लगाने की सलाह देते हैं। गुजरे कुछ वक्त में म्यूचुअल फंड्स ने ऐसी स्कीमें उतारी हैं जो कि खासतौर पर आपको रिटायरमेंट के लिए बचत करने में मदद के लिए बनाई गई हैं। इन्हें पेंशन या रिटायरमेंट फंड्स कहा जाता है। लेकिन, इनके नाम से आप लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के पेंशन प्लान से कनफ्यूज न हों। ये स्कीमें इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स का मिक्स होती हैं। कई सालों तक केवल फ्रैंकलिन इंडिया पेंशन फंड (1997 में लॉन्च) और यूटीआई रिटायमेंट बेनेफिट प्लान (1994 में लॉन्च) ही मार्केट में थे। हाल के सालों में कई और फंड हाउस भी इस कतार में शामिल हो गए हैं।इनवेस्टर्स को उनके रिटायरमेंट तक इन प्लान्स से जोड़े रखने के लिए ये फंड रिटायरमेंट से पहले रिडेम्पशन पर भारी एग्जिट लोड लगाते हैं। साथ ही इनमें तीन साल का लॉक-इन पीरियड भी रहता है। सेक्शन 80C के तहत टैक्स डिडक्शन भी इनवेस्टर्स को इन स्कीमों में टिके रहने के लिए प्रोत्साहित करता है।कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी ने 2017 में रिटायरमेंट फंड्स के लिए एक अलग कैटेगरी बना दी।


आदित्य बिड़ला सन लाइफ, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, निप्पोन इंडिया, प्रिंसिपल और टाटा अपने रिटायरमेंट फंड्स लॉन्च कर चुके हैं।मोट वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर अभिषेक गुप्ता के मुताबिक, ‘सेबी के वर्गीकरण में लॉक-इन को, पांच साल या रिटायरमेंट की उम्र जो भी पहले हो, तय कर दिया गया है।’ वह कहते हैं कि हालांकि, अलग-अलग फंड्स की एसेट एलोकेशन नीतियां अलग होने के चलते ये लॉक-इन अलग-अलग होते हैं। फ्रैंकलिन और यूटीआई में केवल एक प्लान है, जबकि नए फंड्स में कई प्लान उतारे गए हैं ताकि निवेशकों को उनकी जोखिम उठाने की क्षमता के हिसाब से विकल्प दिए जा सकें।फ्रैंकलिन इंडिया, यूटीआई, टाटा, निप्पोन इंडिया और एचडीएफसी के रिटायरमेंट फंड्स में 1।5 लाख रुपये तक का टैक्स डिडक्शन बेनेफिट सेक्शन 80C के तहत मिलता है।


हालांकि, कई अन्य फंड हाउसों की उतारी गई हालिया स्कीमों में टैक्स बेनेफिट नहीं मिलता है।निवेश रणनीतिफ्रैंकलिन इंडिया पेंशन फंड और यूटीआई रिटायरमेंट बेनेफिट प्लान इक्विटीज में 40 पर्सेंट तक निवेश करते हैं। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल हाइब्रिड-कंजर्वेटिव प्लान और टाटा रिटायरमेंट सेविंग्स फंड-कंजर्वेटिव प्लान अपने एसेट्स का एक बड़ा हिस्सा डेट सिक्योरिटीज में लगाते हैं, जबकि इनका केवल 30 पर्सेंट हिस्सा ही इक्विटीज में लगाया जाता है। एचडीएफसी रिटायरमेंट सेविंग्स फंड-इक्विटी प्लान और निप्पोन इंडिया रिटायरमेंट फंड वेल्थ क्रिएशन स्कीम इक्विटीज में 100 फीसदी तक निवेश करते हैं।यहां तक मोटे तौर पर अपनी एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी में भी इन फंड्स की एक-दूसरे से तुलना करना मुश्किल है। मिसाल के तौर पर, एचडीएफसी रिटायरमेंट सेविंग्स फंड-इक्विटी प्लान का गुजरे दो सालों में इक्विटीज में निवेश 79 पर्सेंट से 87 पर्सेंट के बीच रहा है। निप्पोन इंडिया रिटायरमेंट फंड वेल्थ क्रिएशन ने इसी दौरान अपना इक्विटी में निवेश 90 पर्सेंट से 97 पर्सेंट के बीच रखा है। वैल्यू रिसर्च के डेटा से इस बात का पता चला है। दोनों फंड्स में 100 पर्सेंट तक इक्विटी में निवेश करने की इजाजत है।आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल रिटायरमेंट फंड-प्योर इक्विटी प्लान भारी स्तर पर (एसेट्स का 90 पर्सेंट से ज्यादा) लार्ज-कैप स्टॉक्स में निवेश करता रहा है। आदित्य बिड़ला सन लाइफ रिटायरमेंट फंड-द 30s प्लान का 40-45 पर्सेंट निवेश लार्ज-कैप स्टॉक्स में और बकाया मिड और स्मॉल साइज कंपनियों में रहा है। ये स्कीमें क्रमशः मार्च और फरवरी 2019 में लॉन्च हुई हैं।टाटा एएमसी का रिटायरमेंट सेविंग फंड भी लार्ज कैप की ओर झुकाव रखता है। टाटा एएमसी की सीनियर फंड मैनेजर सोनमर उदासी के मुताबिक, ‘लार्ज कैप स्टॉक्स के प्रभाव वाला मल्टी-कैप इक्विटी पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स के लिए मददगार साबित होता है। ग्लोबल स्तर पर बड़ी कंपनियां और बड़ी हो रही हैं और इंडिया में भी ऐसा ही हो रहा है। लार्ज कैप स्टॉक्स में पैसा लगाना चीजों को दुरुस्त करने या पोर्टफोलियो को जरूरत के मुताबिक रीस्ट्रक्चर करने में भी आसानी देता है।’रिटायरमेंट फंड्स या इक्विटी स्कीमें?ज्यादातर इंडीविजुअल इनवेस्टर्स किसी खास वित्तीय लक्ष्य के लिए सेविंग करते वक्त दिमागी गणित करना पसंद करते हैं। अपने रिटायरमेंट फंड के लिए पब्लिक प्रोविडेंट फंड, बच्चे की पढ़ाई के लिए म्यूचुअल फंड निवेश, घूमने-फिरने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे प्लान निवेशक बनाते हैं।


प्लान रुपी इनवेस्टमेंट सर्विसेज के फाउंडर अमोल जोशी कहते हैं, ‘जुनून के साथ किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए पहले से दिमागी गणित करने से यह सुनिश्चित करना आसान हो जाता है कि पैसा किसी और मद में खर्च नहीं किया जाएगा। लेकिन, अगर आपको लगता है कि आपसे गड़बड़ी हो सकती है तो रिटायरमेंट फंड आपकी मदद करते हैं क्योंकि इनमें लॉक-इन पीरियड होता है।’एक्सिस एसेट मैनेजमेंट कंपनी के एमडी और सीईओ चंद्रेश कुमार निगम के मुताबिक, ‘रिटायमेंट फंड लोगों को उनके रिटायरमेंट के लिए फंड करने के लिए एक डेडिकेटेड निवेश विकल्प देता है।’ लंबे लॉक-इन पीरियड वाली ये स्कीमें निवेश के लिए बेहद जरूरी धैर्य रखने में मदद देती हैं। कृष्णा फिनसर्व एलएलपी के पार्टनर वाल्मीकि खत्री के मुताबिक, ‘पांच-साल का लॉक-इन निवेशकों का अपने निवेश में सकारात्मक अनुभव दिखाता है और ये स्कीमें लंबे वक्त में बड़ा पैसा इकट्ठा करने में मददगार साबित होती हैं।’रिटायरमेंट फंड्स में दिक्कत केवल इनके ट्रैक रिकॉर्ड का न होना है। फ्रैंकलिन इंडिया पेंशन फंड और यूटीआई रिटायमेंट बेनेफिट प्लान को छोड़कर ज्यादातर फंड नए हैं। इसके अलावा, अलग-अलग स्ट्रैटेजी होने के चलते इनकी तुलना करना भी मुश्किल हो जाता है।जोशी कहते हैं, ‘ओपन-एंडेड फंड्स में इनवेस्टमेंट आपको रीबैलेंसिंग में मदद देता है जो कि रिटायरमेंट फंड्स में नहीं हो सकता है क्योंकि इनमें लॉक-इन पीरियड होता है।’ जोशी ओपन-एंडेड इक्विटी हाइब्रिड, लार्ज-कैप या मल्टी-कैप फंड्स को ज्यादा तरजीह देते हैं।सोनम उदासी कहती हैं, ‘इक्विटी आधारित रिटायरमेंट फंड इनवेस्टर्स को महंगाई की दर से ज्यादा रिटर्न देने में मदद करते हैं।’जब तक रिटायरमेंट फंड्स का एक ट्रैक रिकॉर्ड तैयार होता है, तब तक डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स पर टिके रहना चाहिए ताकि रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा फंड तैयार हो सके।


निखिल वालवलकर की रिपोर्ट


सोशल मीडिया अपडेट्स के लिए हमें Facebook (https://www.facebook.com/moneycontrolhindi/) और Twitter (https://twitter.com/MoneycontrolH) पर फॉलो करें।